मोदी-ट्रंप की बहुप्रतीक्षित मुलाकात : वैश्विक कूटनीति के केंद्र में भारत और अमेरिका के रिश्ते
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एवियन-ले-बैंस, फ्रांस: जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी भरी मुलाकात को केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक गहरी मित्रता और मजबूत कूटनीतिक तालमेल के रूप में देखा जा रहा है।

व्यापारिक एजेंडा और दिल्ली कनेक्शन अगले 21 घंटों के भीतर दोनों नेताओं की एक और द्विपक्षीय बैठक निर्धारित है। यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 23 और 24 जून को दिल्ली में भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अगले दौर की बातचीत होनी है। उम्मीद है कि ट्रंप प्रशासन भारतीय बाजार तक पहुंच बढ़ाने और कुछ क्षेत्रों में टैरिफ कम करने पर सकारात्मक रुख अपना सकता है। साथ ही फार्मा, आईटी, टेक्सटाइल और सर्विस सेक्टर में भारतीय कंपनियों के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं।

ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी भारत की ऊर्जा सुरक्षा इस वार्ता का मुख्य बिंदु है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते शांति समझौते के संकेतों के बीच, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिरता भारत के लिए महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत का सहयोग चाहता है। रक्षा तकनीक, क्रिटिकल मिनरल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच साझेदारी और मजबूत होने की संभावना है।

FCRA संशोधन पर अमेरिकी सांसदों की आपत्ति इस कूटनीतिक प्रगति के बीच, अमेरिकी सीनेट की विदेश संबंध समिति के कुछ सांसदों ने भारत के विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में किए गए बदलावों पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क है कि इससे ईसाई संस्थाओं पर असर पड़ सकता है। हालांकि, भारत का स्पष्ट रुख है कि यह कानून किसी धर्म विशेष को लक्षित नहीं करता, बल्कि एनजीओ को मिलने वाली विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाने के लिए है।

पारदर्शिता बनाम प्रोपेगैंडा भारत सरकार ने FCRA में बदलाव का उद्देश्य स्पष्ट किया है—यह सुनिश्चित करना कि विदेशी धन का उपयोग केवल उसी जनहितकारी कार्य के लिए हो, जिसके लिए वह प्राप्त हुआ है। पिछले वर्षों में एनजीओ को मिलने वाली हजारों करोड़ की फंडिंग के दुरुपयोग के मामलों को देखते हुए यह संशोधन आवश्यक कदम है। विशेषज्ञ इसे भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी सांसदों के अनावश्यक हस्तक्षेप और भारत की छवि खराब करने की एक सुनियोजित कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

कुल मिलाकर, फ्रांस में हो रही यह मुलाकात न केवल व्यापारिक और रणनीतिक भविष्य तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि दोनों देश वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए कितने करीब आ रहे हैं।

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