अमेरिका की 30 देशों में 120 बायोलैब्स: जाते-जाते तुलसी गबार्ड ने खोला सीक्रेट , क्या बढ़ रहा था खतरा?
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वॉशिंगटन: अमेरिका की खुफिया प्रमुख (DNI) तुलसी गबार्ड ने अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों में एक ऐसा खुलासा किया है जिसने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है। गबार्ड ने आधिकारिक दस्तावेज जारी कर स्वीकार किया है कि अमेरिकी सरकार दुनिया के 30 से अधिक देशों में 120 से ज्यादा बायोलैब्स को फंडिंग दे रही थी।

क्या है तुलसी गबार्ड का खुलासा? तुलसी गबार्ड ने 12 जून को जारी एक बयान में कहा कि उन्होंने वे खुफिया दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं, जिन्हें पहले पर्दे के पीछे रखा गया था। इन लैब्स में खतरनाक पैथोजेन्स (संक्रामक रोगाणु) पर शोध किया जा रहा था। लिस्ट में यूक्रेन की वे लैब्स भी शामिल हैं, जिन्हें लेकर रूस और अमेरिका के बीच युद्ध के दौरान तीखी बहस होती रही है।

ट्रंप प्रशासन का गेन-ऑफ-फंक्शन पर प्रहार डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी सरकार ने बायोलॉजिकल रिसर्च पर सख्त रुख अपनाया है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि इन लैब्स में गेन-ऑफ-फंक्शन (जीवाणुओं की मारक क्षमता बढ़ाने वाली) रिसर्च हो रही थी। मई 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए ऐसी सभी रिसर्च पर रोक लगा दी थी, जिसे प्रशासन ने जोखिम भरा करार दिया है।

रूस के आरोपों को मिली कन्फर्मेशन ? रूस लंबे समय से दावा करता रहा है कि अमेरिका विदेशों में ऐसी लैब चला रहा है, जहां जैविक हथियार बनाने पर काम हो सकता है। अब तक अमेरिका इसे रूसी प्रोपेगेंडा बताकर खारिज करता रहा है। हालांकि, गबार्ड द्वारा जारी दस्तावेजों ने इन लैब्स के अस्तित्व और अमेरिकी फंडिंग की पुष्टि कर दी है, भले ही अमेरिका अभी भी हथियार बनाने के दावों को नकार रहा हो।

हथियार या रिसर्च? क्या है सच? विशेषज्ञों का कहना है कि बायोलैब का होना अपने आप में अवैध नहीं है। दुनिया भर में संक्रामक रोगों और वैक्सीन पर शोध के लिए ऐसी लैब्स अनिवार्य हैं। अमेरिका का तर्क है कि ये लैब्स केवल कोऑपरेटिव थ्रेट रिडक्शन प्रोग्राम का हिस्सा हैं, जो सोवियत संघ के पुराने खतरनाक वैज्ञानिक ढांचे को सुरक्षित बनाने के लिए शुरू की गई थीं।

अभी ही क्यों? तुलसी गबार्ड के इस खुलासे के पीछे के समय पर सवाल उठ रहे हैं। गबार्ड अपना पद छोड़ रही हैं और ऐसे में इन फाइलों को सार्वजनिक करना ट्रंप प्रशासन की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे चीन और अन्य देशों की प्रयोगशालाओं पर कोविड-लीक जैसे सवालों के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इन फाइलों में कोई नई जानकारी है या बस पुरानी बातों पर आधिकारिक मुहर लगाई गई है।

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