फैंस बेशुमार, प्रदर्शन बेकार: क्या भारत का फीफा वर्ल्ड कप खेलना सिर्फ एक सपना है?
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फीफा वर्ल्ड कप 2026 की शुरुआत हो चुकी है। भारतीय फैंस रातों को जागकर लियोनल मेसी और क्रिस्टियानो रोनाल्डो जैसे दिग्गजों का खेल देखने को तैयार हैं। लेकिन इस जुनून के बीच एक टीस हमेशा बनी रहती है—आखिर 140 करोड़ की आबादी वाला भारत इस सबसे बड़े मंच से इतना दूर क्यों है?

30 करोड़ दर्शक, फिर भी खाली हाथ भारत में फुटबॉल के दीवानों की कोई कमी नहीं है। KMG की 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में फुटबॉल के 30 करोड़ से अधिक दर्शक हैं। भारत दुनिया में फुटबॉल का दूसरा सबसे बड़ा दर्शक आधार है, फिर भी भारतीय टीम का फीफा रैंकिंग में 139वें स्थान पर होना खेल प्रशासन और सिस्टम पर बड़े सवाल खड़े करता है।

जमीनी स्तर पर कमजोर ढांचा भारतीय फुटबॉल के पिछड़ने का सबसे बड़ा कारण जमीनी स्तर पर निवेश की कमी है। हमारे क्लब प्रतिभाओं को तराशने के बजाय केवल ऊपरी ढांचे पर ध्यान देते हैं। स्कूल और यूनिवर्सिटी स्तर पर मजबूत टूर्नामेंट्स का अभाव है, जिससे भविष्य के सितारे समय रहते नहीं मिल पाते।

ISL की अनिश्चितता और प्रायोजकों की कमी भले ही इंडियन सुपर लीग (ISL) ने फुटबॉल को ग्लैमर दिया है, लेकिन यह अभी भी व्यावसायिक रूप से अस्थिर है। क्रिकेट की तुलना में फुटबॉल को न तो मीडिया का वैसा कवरेज मिलता है और न ही बड़े प्रायोजक। वित्तीय मजबूती के बिना घरेलू लीगों का विकास गति नहीं पकड़ पा रहा है।

विदेशी फुटबॉल का क्रेज बनाम घरेलू उपेक्षा भारतीय दर्शक यूरोपियन लीग और विदेशी क्लबों के लिए पागल हैं, लेकिन अपनी घरेलू टीमों के लिए वह समर्थन नहीं दिखा पाते। जब तक भारतीय फुटबॉल को अपने प्रशंसकों का घरेलू स्तर पर साथ नहीं मिलेगा, तब तक जमीनी सुधार के लिए आवश्यक निवेश और बदलाव आना मुश्किल है।

अब आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बातें करने से काम नहीं चलेगा। भारत को अपनी अकादमियों में भारी निवेश करना होगा, विदेशी मूल के प्रतिभाशाली भारतीय खिलाड़ियों को राष्ट्रीय ढांचे से जोड़ना होगा और ग्रास-रूट स्काउटिंग को पेशेवर बनाना होगा।

फुटबॉल में भारत की क्षमता अपार है, लेकिन जब तक योजना और जमीन पर काम नहीं होगा, तब तक वर्ल्ड कप में तिरंगा लहराना केवल एक सुखद सपना ही बना रहेगा।

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