7 साल बाद प्योंगयांग पहुंचे शी जिनपिंग: किम जोंग उन के साथ बदली बदली नजर आएगी दुनिया की राजनीति
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सोमवार को सात साल के लंबे अंतराल के बाद उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग पहुंचे। इस दौरे को दोनों देशों के बीच गिरते संबंधों को सुधारने और अमेरिका के साथ वैश्विक तनाव के बीच अपनी ताकत दिखाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

भव्य स्वागत और शक्ति प्रदर्शन प्योंगयांग के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर किम जोंग उन और उनकी पत्नी री सोल जू ने शी जिनपिंग का स्वागत किया। इस दौरान पूरे शहर को दोनों देशों के झंडों, नारों और भारी सुरक्षा व्यवस्था से सजाया गया था। सड़कों पर मौजूद हजारों लोगों और सैन्य सम्मान ने इस दौरे के महत्व को स्पष्ट कर दिया। यह मुलाकात पुतिन के साथ बढ़ते उत्तर कोरियाई संबंधों के बाद हो रही है, जिससे क्षेत्र में समीकरण बदलते दिख रहे हैं।

बदलते समीकरण और अमेरिका का दबाव विश्लेषकों का मानना है कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य उत्तर कोरिया पर चीन के पुराने प्रभाव को फिर से बहाल करना है। अमेरिका के साथ चल रहे व्यापारिक और रणनीतिक संघर्ष के बीच, शी जिनपिंग कोरियाई प्रायद्वीप पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं। उत्तर कोरिया के लिए भी यह दौरा जीवन रेखा जैसा है, क्योंकि उसे रूस के अलावा चीन के आर्थिक समर्थन की सख्त जरूरत है।

आर्थिक मदद और परमाणु महत्वाकांक्षा उम्मीद है कि शी जिनपिंग इस यात्रा के दौरान चावल, उर्वरक (फर्टिलाइजर) और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में आर्थिक मदद का बड़ा पैकेज दे सकते हैं। किम जोंग उन इस समय अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने और अपने परमाणु कार्यक्रम को वैध पहचान दिलाने के लिए चीन का पूरा समर्थन चाहते हैं। शी जिनपिंग ने आधिकारिक तौर पर हेजेमोनिज़्म और दबाव वाली राजनीति के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया है, जो सीधे तौर पर अमेरिका की ओर संकेत है।

क्यों अहम है यह दौरा? विशेषज्ञों के अनुसार, चीन अब संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने के बजाय अपने पड़ोसी को बचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। किम जोंग उन रूस की ओर झुकाव रखने के बावजूद चीन को पूरी तरह दरकिनार नहीं कर सकते। वहीं, शी जिनपिंग के लिए यह उत्तर-पूर्व एशिया में अपना नेतृत्व साबित करने और ट्रंप प्रशासन के सामने एक नई कूटनीतिक चुनौती पेश करने का अवसर है।

आने वाले दो दिनों के समिट में दोनों नेता उन रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा करेंगे, जिनका असर भविष्य की ग्लोबल पॉलिटिक्स पर पड़ना तय है।

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