ममता बनर्जी की मुश्किलें और गहरी: फिरहाद हकीम का इस्तीफा टीएमसी के लिए बड़ा झटका
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) गहरे संकट के दौर से गुजर रही है। पार्टी के वफादार माने जाने वाले और कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। हकीम के इस कदम को ममता बनर्जी के लिए एक बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।

इस्तीफे की पीछे की वजह तृणमूल के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष के अनुसार, हकीम लंबे समय से इस पद से मुक्त होना चाहते थे। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य सरकार द्वारा नगर निगम के कामकाज को लगभग निष्क्रिय कर दिए जाने के बाद, वे एक सम्मानजनक निकास चाहते थे। ममता बनर्जी ने अंततः इस इस्तीफे को स्वीकार कर लिया है।

पार्टी में टूट और बागी गुट हकीम का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब पार्टी पहले से ही आंतरिक कलह से जूझ रही है। टीएमसी के 80 में से करीब 58 विधायकों ने अलग गुट बना लिया है। इतना ही नहीं, बागियों ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया है, जिन्हें विधानसभा में आवंटित कक्ष की चाबी भी सौंप दी गई है। टूट की आशंका को देखते हुए टीएमसी ने अपने सभी सांगठनिक ढांचे और कमेटियों को भंग कर दिया है।

कौन हैं फिरहाद हकीम? फिरहाद हकीम ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक रहे हैं। 2018 से कोलकाता के मेयर पद पर काबिज हकीम ने राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में शहरी विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला है। वे कोलकाता नगर निगम के पहले मुस्लिम मेयर बनकर इतिहास का हिस्सा बने थे। उनका जाना ममता के लिए एक बड़ा न केवल प्रशासनिक बल्कि प्रतीकात्मक नुकसान भी है।

अभिषेक बनर्जी के साथ दूरी? राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि हाल के दिनों में फिरहाद हकीम और अभिषेक बनर्जी के बीच दूरियां बढ़ी थीं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब केएमसी ने अभिषेक बनर्जी से जुड़ी संपत्तियों को नोटिस भेजे थे, तब हकीम ने खुद को इस मामले से पूरी तरह अलग कर लिया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, जो पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों का संकेत था।

विपक्ष का हमला और ममता का पलटवार निष्कासित नेता हुमायूं कबीर ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी की कार्यशैली पर निशाना साधा है। उनका दावा है कि अभिषेक बनर्जी को जरूरत से ज्यादा तरजीह देना पार्टी के बिखराव का मुख्य कारण है। वहीं, इन तमाम संकटों के बीच ममता बनर्जी ने दावा किया है कि पार्टी और मजबूत होकर उभरेगी। उन्होंने केंद्र सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है।

आगे की राह क्या? टीएमसी ने आत्म-मंथन की बात कही है, लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद नाजुक है। पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं और पुराने वफादार एक-एक करके साथ छोड़ रहे हैं। क्या ममता बनर्जी इस मलबे से पार्टी को दोबारा खड़ा कर पाएंगी, यह आने वाले समय की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है।

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