अचानक कोलकाता क्यों पहुंचे अमेरिकी विदेश मंत्री? रूबियो के इस दौरे के पीछे छिपा 234 साल पुराना राज!
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नई दिल्ली: भारतीय कूटनीति के गलियारों में शनिवार की सुबह एक नई हलचल लेकर आई। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो अपनी चार दिवसीय भारत यात्रा पर पहुंच चुके हैं। पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच उपजे राजनयिक और व्यापारिक तनावों के बीच, यह दौरा बेहद संवेदनशील और रणनीतिक माना जा रहा है।

दिल्ली के बजाय कोलकाता से शुरुआत: आखिर क्यों? इस हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक ड्रामे की शुरुआत राजधानी दिल्ली से नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से हुई। शनिवार सुबह जब रूबियो का विमान कोलकाता उतरा, तो कई विश्लेषक हैरान रह गए।

दरअसल, इसके पीछे एक गहरा ऐतिहासिक संदर्भ है। कोलकाता में अमेरिका का वाणिज्य दूतावास स्थित है, जिसकी स्थापना 1792 में हुई थी। यह अमेरिका के सबसे पुराने दूतावासों में से एक है। रूबियो ने कूटनीतिक संदेश देने के लिए इसी ऐतिहासिक भूमि को चुना, जो भारत के साथ अमेरिका के शुरुआती जुड़ाव का प्रतीक है।

ऊर्जा, रक्षा और चीन: क्या है असली एजेंडा? मियामी से रवाना होने से पहले ही रूबियो ने एक बड़ा बयान देकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल पैदा कर दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत को असीमित ऊर्जा निर्यात करने के लिए तैयार है।

माना जा रहा है कि ईरान संकट और खाड़ी देशों से आपूर्ति में अनिश्चितता के बीच, अमेरिका भारत को रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक मजबूत विकल्प दे रहा है। इसके साथ ही, चीन का मुकाबला करना इस दौरे का मुख्य एजेंडा है।

कड़वाहट को मिटाने की चुनौती पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप के दंडात्मक टैरिफ (Punitive Tariffs) और व्यापारिक तनाव ने दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घोल दी थी। साथ ही, ट्रंप द्वारा भारत-पाकिस्तान तनाव में मध्यस्थता का दावा करने और नई अमेरिकी इमिग्रेशन नीति (H1B वीज़ा शुल्क) ने भी संबंधों को प्रभावित किया था। रूबियो का यह दौरा इन्हीं दरारों को भरने के लिए डैमेज कंट्रोल के रूप में देखा जा रहा है।

क्वाड का महामंच: बीजिंग को घेरने की तैयारी? रूबियो का शेड्यूल किसी थ्रिलर फिल्म की तरह है। कोलकाता के बाद वे नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात करेंगे। इसके बाद वे आगरा और जयपुर का दौरा करेंगे।

दौरे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मंगलवार को होने वाली क्वाड (Quad) विदेश मंत्रियों की बैठक है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के प्रतिनिधियों के साथ होने वाली इस चर्चा में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य और आर्थिक प्रभाव को रोकने के लिए एक ठोस रणनीति पर मुहर लगानी तय है।

अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या वाशिंगटन, भारत को अपनी व्यापारिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं में वापस पूरी तरह से जोड़ पाएगा या भारत अपने स्वतंत्र कूटनीतिक रुख पर ही कायम रहेगा।

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