# वीआईपी कल्चर को बाय-बाय: बरेली में डीएम और मंत्रियों ने छोड़ी लग्जरी गाड़ियां, बस और ई-रिक्शा से भरा सफर
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बरेली: प्रशासनिक गलियारों में अक्सर गाड़ियों के काफिले और हूटरों की आवाज वीआईपी संस्कृति की पहचान मानी जाती है, लेकिन बरेली में शनिवार को एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली। जिला प्रशासन ने सादगी और पर्यावरण संरक्षण का एक बड़ा उदाहरण पेश किया है।

काफिले की जगह बस की सवारी

बरेली के जिलाधिकारी अविनाश सिंह शनिवार को मीरगंज में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में शामिल होने के लिए अपनी सरकारी गाड़ी का काफिला पीछे छोड़ एक बस में सवार होकर पहुंचे। उनके साथ जिले के तमाम आला अधिकारी भी मौजूद थे। यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डीजल-पेट्रोल बचाओ मुहिम के तहत की गई है।

नो व्हीकल डे की नई शुरुआत

डीएम के निर्देश पर अब बरेली में सप्ताह में दो दिन—सोमवार और शनिवार—को नो व्हीकल डे के रूप में मनाया जाएगा। इस दौरान अधिकारी अपने निजी और सरकारी वाहनों का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसका उद्देश्य न केवल सरकारी ईंधन की बचत करना है, बल्कि सड़कों पर ट्रैफिक जाम की समस्या को कम करना भी है।

पहले भी हटा चुके हैं एस्कॉर्ट

यह कोई पहली बार नहीं है जब डीएम अविनाश सिंह ने सादगी की मिसाल पेश की हो। इससे पहले भी वे फिजूलखर्ची पर लगाम लगाने के लिए अपने काफिले से सुरक्षा गाड़ियों के दस्ते (एस्कॉर्ट) को हटा चुके हैं। उनका मानना है कि प्रशासनिक अधिकारियों और जनता के बीच वीआईपी तामझाम की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

वन मंत्री ने चुनी ई-रिक्शा की सवारी

इस मुहिम में जिले के जनप्रतिनिधि भी पीछे नहीं हैं। राज्य के वन मंत्री डॉ. अरुण कुमार ने भी शनिवार को ई-रिक्शा में सफर कर आम आदमी के बीच एक संदेश दिया। मंत्री खुद अपने नगर भ्रमण के लिए अब इलेक्ट्रिक कार का उपयोग कर रहे हैं और उन्होंने भी अपनी सुरक्षा में लगी एस्कॉर्ट गाड़ियों को पहले ही हटा दिया है।

फिजूलखर्ची पर कड़ा प्रहार

अधिकारियों द्वारा सरकारी संसाधनों के इस विवेकपूर्ण उपयोग की सराहना की जा रही है। एक साथ बस में यात्रा करने से न केवल सरकारी खजाने पर पड़ने वाले ईंधन के बोझ में कमी आई है, बल्कि यह आम नागरिकों के लिए भी एक प्रेरक संदेश है कि पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत शीर्ष स्तर से ही संभव है।

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