सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का बड़ा ऐलान: अब नहीं बढ़ेंगे टिकट के दाम, संकट में हैं थिएटर मालिक
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तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री के सिंगल स्क्रीन थिएटर मालिकों ने एक बड़ा और प्रशंसनीय फैसला लिया है। मंगलवार, 12 मई 2026 को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के एग्जिबिटर्स की हुई एक इमरजेंसी मीटिंग में यह तय किया गया कि सिंगल स्क्रीन थिएटरों में टिकट की कीमतें नहीं बढ़ाई जाएंगी। यह निर्णय विशेष रूप से आम और मध्यम वर्गीय दर्शकों को राहत देने के लिए लिया गया है।

मुश्किल में क्यों हैं सिंगल स्क्रीन थिएटर? वर्तमान में सिंगल स्क्रीन थिएटर भारी वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। मेंटेनेंस, बिजली के बिल और स्टाफ की सैलरी के साथ-साथ फिक्स्ड रेंटल सिस्टम ने मालिकों की कमर तोड़ दी है। इस सिस्टम के तहत थिएटर मालिक को फिल्म की सफलता या असफलता की परवाह किए बिना प्रोड्यूसर को एक तय रकम देनी होती है। कई मालिकों का कहना है कि वे सिनेमा के प्रति अपने लगाव के कारण थिएटर चला रहे हैं, वरना इन इमारतों को गोदाम के तौर पर किराए पर देना कहीं अधिक मुनाफे का सौदा है।

आम जनता के लिए बड़ा फैसला एग्जिबिटर्स का स्पष्ट मानना है कि अगर सरकार बड़ी फिल्मों की रिलीज के समय टिकट के दाम बढ़ाने की अनुमति भी देती है, तब भी वे इसे लागू नहीं करेंगे। उनका तर्क है कि मल्टीप्लेक्स की महंगी टिकटें हर किसी के बस की बात नहीं है, ऐसे में सिंगल स्क्रीन ही गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए मनोरंजन का एकमात्र जरिया है।

रेंटल सिस्टम बनाम परसेंटेज शेयरिंग मीटिंग के दौरान एग्जिबिटर्स ने मौजूदा रेंटल सिस्टम को खत्म करने और मल्टीप्लेक्स की तर्ज पर परसेंटेज शेयरिंग मॉडल लागू करने की पुरजोर मांग की है। उनका तर्क है कि जब मल्टीप्लेक्स को परसेंटेज शेयरिंग का लाभ मिलता है, तो सिंगल स्क्रीन के साथ भेदभाव क्यों? दूसरे राज्यों में बड़ी पैन-इंडिया फिल्में भी परसेंटेज शेयरिंग पर चलती हैं, जबकि तेलुगु राज्यों में सिंगल स्क्रीन मालिकों पर भारी किराया थोपा जाता है।

फिल्मों की घटती उम्र और भविष्य एग्जिबिटर्स ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि पहले फिल्में कई हफ्तों तक चलती थीं, लेकिन अब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और दर्शकों के बदलते मिजाज के कारण फिल्में दो-तीन हफ्ते में ही सिनेमाघरों से उतर जाती हैं। थिएटर मालिकों ने साफ कर दिया है कि यदि प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स ने परसेंटेज शेयरिंग के मुद्दे पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया, तो सिंगल स्क्रीन थिएटरों का अस्तित्व बचाना लगभग असंभव हो जाएगा।

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