सीएम का पद ममता बनर्जी की पैतृक संपत्ति नहीं है... इस्तीफा देने से इनकार पर भाजपा का तीखा प्रहार
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। भाजपा ने 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) 80 सीटों पर सिमट गई है। इस हार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया है कि वह इस्तीफा नहीं देंगी।

दिलीप घोष का कड़ा प्रहार खड़गपुर से भाजपा के विजयी उम्मीदवार दिलीप घोष ने ममता बनर्जी के बयान पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, एक दिन तो सबको दुनिया छोड़नी ही है, यह कुर्सी सिर्फ दो दिन की है। उन्हें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि यह उनकी पैतृक संपत्ति है।

घोष ने आगे कहा कि 15 साल के शासन में ममता ने भ्रष्टाचार और हिंसा के अलावा कुछ नहीं दिया। उन्होंने डॉक्टर के साथ हुई रेप और मर्डर की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि उनके परिवार और मां के साथ जो अपमानजनक व्यवहार हुआ, जनता उसका हिसाब जरूर लेगी।

संविधान सबसे ऊपर: समिक भट्टाचार्य पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इस मुद्दे पर संवैधानिक मर्यादा की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि इस्तीफा देने या न देने का सवाल व्यक्तिगत राय का नहीं, बल्कि संविधान का है। जो कुछ भी होगा वह संवैधानिक दायरे में ही होगा, क्योंकि संविधान ही सर्वोच्च है।

मानसिक स्थिति ठीक नहीं : तथागत रॉय भाजपा नेता तथागत रॉय ने ममता बनर्जी के बयान पर हैरानी जताते हुए कहा, मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा कि कोई हारने के बाद भी कुर्सी छोड़ने से मना करे। क्या वह नहीं समझतीं कि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर उन्हें पद छोड़ना ही पड़ेगा? मुझे नहीं लगता कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक है।

TMC का अपना तर्क वहीं, TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने बचाव करते हुए कहा कि राज्य में पिछले 3 महीने से आदर्श आचार संहिता लागू थी, जिसके कारण कामकाज मुख्य सचिव देख रहे थे। उन्होंने तर्क दिया कि जब ममता बनर्जी बीते तीन महीनों से मुख्यमंत्री के तौर पर काम ही नहीं कर रही थीं, तो इस्तीफे का सवाल ही कहां पैदा होता है।

सुरक्षा घेरे में बदलाव इस सियासी खींचतान के बीच, राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की अतिरिक्त सुरक्षा हटा दी है। एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक के बाद यह फैसला लिया गया है, जो कल सुबह से प्रभावी हो जाएगा। राज्य में सत्ता परिवर्तन की आहट के साथ ही सुरक्षा में कटौती को एक बड़े प्रशासनिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

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