दार्जिलिंग का गोरखा दांव: अमित शाह के 6 महीने वाले वादे से गरमाया बंगाल का सियासी पारा
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के प्रचार के अंतिम दौर में दार्जिलिंग की पहाड़ियों ने एक बार फिर केंद्र बिंदु का स्थान ले लिया है। कर्सियांग में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गोरखा समुदाय को लेकर एक बड़ा सियासी कार्ड खेला है। उन्होंने वादा किया है कि अगर बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनती है, तो दशकों पुराने गोरखा मुद्दे का समाधान महज छह महीने के भीतर कर दिया जाएगा।

क्या है दशकों पुराना गोरखा मुद्दा?

दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और आसपास के पहाड़ी इलाकों में गोरखा समुदाय लंबे समय से अपनी अलग प्रशासनिक पहचान या गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलित रहा है। यह मुद्दा पहचान, संस्कृति और स्वायत्तता से सीधे तौर पर जुड़ा है। अमित शाह ने अपने भाषण में हालांकि गोरखालैंड शब्द का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनका इशारा साफ था कि पार्टी गोरखाओं की भावनाओं और उनकी शर्तों के अनुरूप समाधान निकालने के लिए प्रतिबद्ध है।

विकास बनाम पहचान की जंग

अमित शाह ने ममता बनर्जी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने विकास, रोजगार और सुरक्षा के मुद्दों को दरकिनार कर केवल राजनीति की है। शाह ने कहा कि राज्य में पनप रहे भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से जनता त्रस्त है और केंद्र सरकार के साथ सहयोग न करने की नीति ने स्थिति को और खराब किया है। वहीं, टीएमसी सरकार इसे चुनावी हथकंडा करार दे रही है।

BJP का मेनिफेस्टो और 15 बड़े वादे

गोरखा मुद्दे के अलावा, BJP ने अपने संकल्प पत्र में 15 प्रमुख वादे किए हैं। इनमें समान नागरिक संहिता (UCC) को छह महीने के भीतर लागू करना, सरकारी कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग का कार्यान्वयन, घुसपैठ पर सख्त कार्रवाई और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर शामिल हैं। पार्टी का दावा है कि ये वादे बंगाल की तस्वीर बदलने के लिए पर्याप्त हैं।

बदलेगा चुनावी समीकरण?

दार्जिलिंग की राजनीति में गोरखा वोट बैंक हमेशा से निर्णायक रहा है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के प्रमुख बिमल गुरुंग ने भी शाह के आश्वासन पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। अब सवाल यह है कि क्या शाह का छह महीने वाला वादा मतदाताओं के बीच भरोसे में तब्दील हो पाएगा? यह देखना दिलचस्प होगा कि पहाड़ी इलाकों की जनता इस आश्वासन को एक ठोस समाधान के रूप में देखती है या महज चुनावी जुमला मानती है।

अगले कुछ दिनों में आने वाले चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि क्या यह वादा बंगाल की राजनीति में वाकई कोई बड़ा बदलाव लाने में सफल रहा या यह सिर्फ एक और राजनीतिक घोषणा बनकर रह गया।

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