मलबे से निकली मासूमियत: जब युद्ध के अंधेरे में भी बच्चों ने बनाए सूरज
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युद्ध की विभीषिका में अक्सर राजनीति और रणनीतियों की चर्चा होती है, लेकिन नई दिल्ली के ईरानी दूतावास में लगी एक प्रदर्शनी ने उस दर्दनाक सच को सामने ला दिया है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। बच्चे आज भी सूर्य का चित्र बनाते हैं शीर्षक वाली यह प्रदर्शनी उन मासूमों की याद दिलाती है, जिनकी दुनिया युद्ध के पहले ही दिन ढह गई थी।

मलबे से बरामद उम्मीदें यह प्रदर्शनी ईरान के मीनाब शहर के उस प्राथमिक विद्यालय की तस्वीरों को प्रदर्शित करती है, जिसे एक भीषण हमले में निशाना बनाया गया था। बचाव दल जब मलबे को हटा रहा था, तब उन्हें ये चित्र मिले। 170 से अधिक लोगों की जान लेने वाले इस हमले में बच्चों के रंगों से भरे पन्ने मलबे के नीचे दब गए थे। आज ये कागज के टुकड़े एक दस्तावेज की तरह दीवार पर टंगे हैं, जो युद्ध की क्रूरता और बच्चों की बेगुनाही के बीच के अंतर को चीरकर रख देते हैं।

दर्द और सूरज का गहरा नाता प्रदर्शनी में रखे चित्रों में सूरज, आसमान और रंगीन दुनिया है। सवाल यह है कि जिस बच्चे ने अपनी आंखों के सामने स्कूल को गिरते देखा और अपनों को खोया, वह फिर भी सूरज क्यों बनाता है? शायद इसलिए, क्योंकि उनके लिए सूरज सिर्फ एक चित्र नहीं, बल्कि जीवन की जिद है। वहां आने वाले दर्शक इन तस्वीरों को देखकर भावुक हो रहे हैं। हर रेखा एक टूटे हुए सपने की गवाह है, जो आज भी शांति की उम्मीद संजोए हुए है।

बढ़ता संघर्ष और कूटनीतिक हलचल मीनाब की इस त्रासदी ने पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध की आग भड़का दी है। ईरान की जवाबी कार्रवाई और उसके बाद उपजे तनाव ने क्षेत्र को एक बड़े संकट में धकेल दिया है। इस मानवीय त्रासदी के प्रति संवेदना जताते हुए ईरानी नेता मोहम्मद बाघेर गालिबफ ने मीनाब के बच्चों की तस्वीरों को अपने साथ रखकर दुनिया को एक झकझोर देने वाला संदेश दिया था। उन्होंने इन मासूमों को अपना सहयात्री बताया।

शांति की अनकही पुकार भारत में ईरान के प्रतिनिधि अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने इस मौके पर कहा कि दोनों देशों के संबंध सदियों पुराने हैं और ऐसे संकटों में और गहरे होते हैं। उन्होंने कूटनीतिक प्रयासों की कमी पर भी सवाल उठाए। यह प्रदर्शनी केवल एक कलात्मक प्रस्तुति नहीं है, बल्कि दुनिया के लिए एक चेतावनी है।

युद्ध की राख के नीचे से निकली ये कलाकृतियां हमें याद दिलाती हैं कि शांति केवल फाइलों में होने वाला समझौता नहीं है, बल्कि यह समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक बच्चे सूरज बनाते रहेंगे, तब तक दुनिया में कहीं न कहीं रोशनी की उम्मीद भी बची रहेगी।


प्रदर्शनी का विवरण:

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