नोएडा में न्यूनतम वेतन की आग: सड़कों पर उतरे मजदूर, क्यों बार-बार दिया जा रहा गुरुग्राम का उदाहरण?
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नोएडा की औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत हजारों मजदूर इस समय अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हो रहा यह विरोध प्रदर्शन अब उग्र रूप लेता जा रहा है। मजदूरों का आरोप है कि उन्हें नाममात्र का वेतन दिया जा रहा है, जिससे महंगाई के इस दौर में परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।

मजदूरों का दर्द: 300 रुपये का दिहाड़ा और शोषण

प्रदर्शनकारी मजदूरों का कहना है कि उन्हें महीने के महज 10 से 11 हजार रुपये मिल रहे हैं। एक मजदूर ने बताया कि देहाती इलाकों में भी दिहाड़ी 500-600 रुपये है, जबकि नोएडा जैसी जगह पर उन्हें सिर्फ 300 रुपये प्रतिदिन मिल रहे हैं। इसके अलावा, कंपनियों में मैनेजरों का दुर्व्यवहार और महिलाओं के साथ काम के दौरान अमानवीय व्यवहार भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है।

क्या हैं प्रमुख मांगें?

मजदूरों ने अपनी मांगों की एक स्पष्ट फेहरिस्त सामने रखी है:

गुरुग्राम का उदाहरण क्यों बन रहा है वजह?

नोएडा के मजदूरों के असंतोष को हरियाणा सरकार के एक फैसले ने हवा दी है। हरियाणा सरकार ने हाल ही में न्यूनतम मजदूरी में करीब 35 फीसदी का इजाफा किया है, जो 1 अप्रैल 2026 से लागू हो गया है।

हरियाणा में अब अनस्किल्ड वर्कर को लगभग 15,220 रुपये, सेमी-स्किल्ड को 16,780 रुपये और स्किल्ड वर्कर को 18,500 रुपये से अधिक वेतन मिलेगा। पड़ोसी राज्य में हुए इस बड़े बदलाव ने नोएडा के मजदूरों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब वहां सरकार यह कर सकती है, तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं?

क्या कहता है न्यूनतम मजदूरी का नियम?

श्रम मंत्रालय के नियमों के अनुसार, न्यूनतम मजदूरी तय करते समय तीन मुख्य कारकों का ध्यान रखा जाता है: भौगोलिक स्थिति, कार्य अनुभव और कौशल (Skill Level)। केंद्र सरकार ने अकुशल कामगारों के लिए 783 रुपये, अर्ध-कुशल के लिए 868 रुपये, कुशल के लिए 954 रुपये और अति-कुशल के लिए 1035 रुपये प्रतिदिन की दर निर्धारित की है।

मजदूरों का मुख्य सवाल यही है कि जब केंद्र सरकार के मानक इतने स्पष्ट हैं और अन्य राज्यों में इसका पालन हो रहा है, तो नोएडा की निजी कंपनियां इन नियमों को दरकिनार कर उनका शोषण क्यों कर रही हैं? अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस बढ़ते असंतोष को किस तरह शांत करता है।

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