क्या फिर छिड़ेगी जंग? इस्लामाबाद में फेल क्यों हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता?
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अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस्लामाबाद में चल रही शांति वार्ता बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई है। इस असफलता ने एक बार फिर मध्य-पूर्व में युद्ध के बादल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट किया है कि बातचीत के विफल होने का मुख्य कारण ईरान का वाशिंगटन की शर्तों को मानने से इनकार करना है।

1. परमाणु हथियारों पर अटका पेच इस वार्ता का मूल उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था। अमेरिका चाहता है कि ईरान न केवल अभी, बल्कि भविष्य में भी परमाणु शक्ति बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी तरह त्याग दे। वाशिंगटन की डिमांड है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने वाले संसाधनों को जुटाना बंद करे, जिसे तेहरान ने स्वीकार नहीं किया।

2. वाशिंगटन की ठोस गारंटी की मांग अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका को ईरान से एक स्पष्ट और ठोस आश्वासन चाहिए। अमेरिका का मानना है कि केवल कुछ वर्षों की शांति काफी नहीं है, बल्कि ईरान को दीर्घकालिक रूप से परमाणु हथियार न बनाने की नीति पर कायम रहने की गारंटी देनी होगी। फिलहाल, अमेरिका को तेहरान की ओर से ऐसा कोई भरोसा नहीं मिला है।

3. परमाणु केंद्रों को नष्ट करने का दावा ट्रंप प्रशासन का मुख्य लक्ष्य ईरान की परमाणु क्षमता को पूरी तरह खत्म करना है। वेंस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि ईरान के कई परमाणु संवर्धन (एनरिचमेंट) केंद्रों को पहले ही नष्ट किया जा चुका है। इसके बावजूद, अमेरिका की चिंता कम नहीं हुई है क्योंकि उसे डर है कि ईरान कभी भी अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से तेजी से शुरू कर सकता है।

4. ईरान ने ठुकराईं कड़ी शर्तें ईरान ने अमेरिका की इन कठोर शर्तों को मानने से साफ इनकार कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि ईरान अपनी सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करने को तैयार नहीं है। वाशिंगटन की शर्तों को दबाव के रूप में देखते हुए तेहरान ने वार्ता की मेज पर अपनी असहमति जता दी है।

5. अब आगे क्या? बढ़ता वैश्विक तनाव वार्ता के फेल होने के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें पश्चिम एशिया पर टिकी हैं। अमेरिका अपनी शर्तों पर अड़ा है और ईरान ने झुकने से मना कर दिया है, जिससे क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका प्रबल हो गई है। यदि बातचीत का रास्ता नहीं निकला, तो यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकती है।

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