इज़रायल को श्राप बताने वाले पाकिस्तान का दोहरा चेहरा: क्या अपने पुराने गुनाहों को भूल गया इस्लामाबाद?
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इस्लामाबाद के गलियारों से एक बार फिर इज़रायल के खिलाफ ज़हर उगला गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इज़रायल के अस्तित्व को कैंसर और इंसानियत के लिए श्राप करार दिया है। उनके इस भड़काऊ बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की तीखी आलोचना हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि जो मुल्क खुद अपने ही नागरिकों के खून से सने हाथों को छिपा नहीं पाया, वह दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने की हैसियत कैसे रखता है?

1971 का रक्तरंजित इतिहास: जब अपनों का ही किया कत्लेआम

इज़रायल पर टिप्पणी करने से पहले ख्वाजा आसिफ को 1971 के उस काले अध्याय को याद करना चाहिए, जिसे इतिहास ऑपरेशन सर्चलाइट के नाम से जानता है। तब के पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना ने नृशंसता की हद पार कर दी थी। उस दौरान करीब 30 लाख निर्दोष लोगों की हत्या की गई और लाखों महिलाओं के साथ दरिंदगी हुई। बुद्धिजीवियों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। यह नरसंहार मानव इतिहास के सबसे शर्मनाक पन्नों में से एक है जिसे पाकिस्तान आज भी स्वीकार करने से कतराता है।

बलोचिस्तान और पश्तून इलाकों में जारी दमन चक्र

पाकिस्तान का अत्याचार केवल अतीत तक सीमित नहीं है। बलोचिस्तान में आज भी पाकिस्तानी सेना का दमन जारी है। वहां एनफोर्स्ड डिसएपीयरेंस (जबरन गायब करना) का खेल आम है। हज़ारों बलोच युवा लापता हैं, जिनकी क्षत-विक्षत लाशें अक्सर सुनसान इलाकों में मिलती हैं। पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (PTM) के कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंसकर उनकी आवाज़ को कुचला जा रहा है। अपनी ही धरती पर अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ टैंक और हथियारों का इस्तेमाल करना पाकिस्तान की मानवाधिकार नीति का असली चेहरा है।

अहमदिया समुदाय और धार्मिक अल्पसंख्यकों का नर्क

पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति बदतर है। अहमदिया समुदाय को तो वहां मुसलमान मानने तक की कानूनी मनाही है। उनकी मस्जिदों को गिराया जाता है और कब्रों को अपवित्र किया जाता है। हिंदू और ईसाई लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन और ईशनिंदा के नाम पर भीड़ द्वारा लोगों को जिंदा जला देना वहां की कड़वी हकीकत है। जो देश अपने ही अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम रहा है, उसका अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवाधिकारों की दुहाई देना केवल एक ढोंग है।

कूटनीतिक मर्यादा का उल्लंघन और दोहरा चरित्र

ख्वाजा आसिफ का बयान केवल कूटनीतिक मर्यादा के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की असुरक्षा को भी दर्शाता है। एक तरफ प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शांति वार्ता का दिखावा कर दुनिया को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं उनके मंत्री विनाश की आग भड़का रहे हैं। इज़रायल ने इस बयान को यहूदी विरोधी घृणा करार दिया है।

पाकिस्तान अक्सर कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों का सहारा लेकर अपने आंतरिक नरसंहारों और नाकामियों से दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश करता है। लेकिन आज के डिजिटल युग में पाकिस्तान का यह दोहरा चरित्र किसी से छिपा नहीं है। दूसरों पर श्राप का आरोप लगाने से पहले पाकिस्तान को अपने गिरेबान में झांकने की सख्त जरूरत है।

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