अंतरिक्ष में प्लंबर बनीं नासा की एस्ट्रोनॉट: चांद मिशन के दौरान टॉयलेट ने क्यों मचाया बवाल?
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2 अप्रैल, 2026 को कैनेडी स्पेस सेंटर से रवाना हुआ नासा का आर्टेमिस 2 मिशन 53 सालों में पहला मानवयुक्त चंद्र मिशन है। हालांकि, तकनीकी उपलब्धियों के बीच यह मिशन अपने टॉयलेट की खराबी को लेकर चर्चा में है। चांद की ओर बढ़ते ओरियन कैप्सूल के अंदर जब सिस्टम ने काम करना बंद किया, तो मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टीना कोच को खुद स्पेस प्लंबर बनकर उसे ठीक करना पड़ा।

क्यों है अंतरिक्ष में टॉयलेट जाना एक चुनौती? धरती पर गुरुत्वाकर्षण कचरे को नीचे खींच लेता है, लेकिन अंतरिक्ष में सब कुछ हवा में तैरने लगता है। ओरियन कैप्सूल का यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम (UWMS) वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है, जो कचरे को खींचने के लिए पंखे का उपयोग करता है। यह मशीन इतनी शोर करती है कि यात्रियों को कान बचाने के लिए ईयर प्रोटेक्शन पहनना पड़ता है।

तीन बार फेल हुआ करोड़ों का सिस्टम आर्टेमिस 2 के दौरान यह सिस्टम तीन बार खराब हुआ। पहली बार पंखा जाम हो गया। दूसरी बार, यान से 3,20,000 किलोमीटर दूर वेंट लाइन में पेशाब जमने से रुकावट आई। नासा ने यान को सूरज की तरफ घुमाया ताकि गर्मी से बर्फ पिघल सके, लेकिन समस्या जस की तस बनी रही।

बर्फ नहीं, रसायनों की प्रतिक्रिया थी असली विलेन गहन जांच में पता चला कि असली समस्या बर्फ नहीं थी। पाइपों में बैक्टीरिया रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाले एंटी-बायोफिल्म एजेंट ने पेशाब के कैल्शियम साल्ट के साथ मिलकर एक सख्त मलबा बना दिया था। इसने फिल्टर को बुरी तरह ब्लॉक कर दिया था, जिससे सिस्टम ठप हो गया।

इमरजेंसी में क्या करते हैं अंतरिक्ष यात्री? अपोलो मिशन के समय टॉयलेट नहीं होते थे और यात्री प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल करते थे। आर्टेमिस 2 में भी बैकअप के तौर पर कोलैप्सेबल यूरिनल बैग मौजूद हैं, जो ऐसी आपातकालीन स्थितियों में काम आते हैं।

भविष्य के मिशनों के लिए कड़ा सबक आर्टेमिस 2 एक टेस्ट फ्लाइट है, जिसका उद्देश्य भविष्य की कमियों को दूर करना है। नासा की ओरियन डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर डेबी कोर्थ के अनुसार, लंबी अवधि के मिशनों में टॉयलेट फेल होना एक बड़ी चुनौती है। अब इंजीनियरों को फिल्टर के डिजाइन और रसायनों के मिश्रण में बड़े बदलाव करने होंगे। 11 अप्रैल को सुरक्षित वापसी के बाद, नासा इस स्पेस टॉयलेट की पूरी जांच करेगा ताकि भविष्य के मंगल मिशनों के लिए राह आसान हो सके।

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