बिना पेट्रोल-डीजल के होगी घर वापसी ! जानें चांद की ग्रेविटी का वह कमाल, जिससे खुद-ब-खुद लौट आएगा NASA का स्पेसक्राफ्ट
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अंतरिक्ष की दुनिया में एक बार फिर इंसान ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। नासा का आर्टेमिस-2 मिशन अब अपने सबसे रोमांचक पड़ाव पर है। ओरियन स्पेसक्राफ्ट के इंजनों ने गहरी अंतरिक्ष में 6 मिनट तक फ्यूल बर्न करके एक ऐसी गति पकड़ी है, जो एस्ट्रोनॉट्स की सुरक्षित वापसी का रास्ता साफ करती है।

लूनर स्लिंगशॉट: कुदरत का फ्री-रिटर्न पास आर्टेमिस-2 मिशन एक खास फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी (Free-Return Trajectory) का पालन कर रहा है। इसमें वापसी के लिए भारी मात्रा में ईंधन की जरूरत नहीं होगी। जैसे ही ओरियन चंद्रमा के करीब पहुंचेगा, चांद का गुरुत्वाकर्षण बल उसे एक गुलेल (Slingshot) की तरह अपनी ओर खींचेगा।

यह खिंचाव अंतरिक्ष यान की दिशा को मोड़ देगा और उसे वापस पृथ्वी की ओर उछाल देगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर वापसी के दौरान इंजन फेल भी हो जाएं, तब भी चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल यान को खुद ही धरती के रास्ते पर ले आएगा।

5 मिनट 50 सेकंड का पावर गेम हाल ही में मिशन कंट्रोल से मिले सिग्नल के बाद ओरियन के इंजन ने 5 मिनट 50 सेकंड तक जबरदस्त फायरिंग की। इसे ट्रांसलूनर इंजेक्शन (TLI) कहा जाता है। इसने करीब 6,000 पाउंड का थ्रस्ट पैदा किया—इतनी ताकत जो किसी कार को पल भर में सुपरफास्ट बना दे। इसी ताकत ने स्पेसक्राफ्ट को धरती की कक्षा से बाहर निकाल कर चांद की तरफ धकेला है।

चांद के पीछे दिखेगा रहस्यमयी नजारा जब ओरियन चांद के पास पहुंचेगा, तो एस्ट्रोनॉट्स को एक अद्भुत अनुभव होगा। वे करीब एक घंटे तक सूर्य ग्रहण का नजारा देखेंगे। चांद के पीछे सूरज के छिपते ही अंधेरा छा जाएगा, जिससे उन्हें चांद की सतह पर गिरते उल्कापिंडों और अंतरिक्ष की धूल को देखने का मौका मिलेगा। साथ ही, उन्हें सूर्य की बाहरी परत कोरोना का दुर्लभ दृश्य भी दिखाई देगा।

1972 के बाद पहली बार इतनी दूर यह मिशन ऐतिहासिक है क्योंकि 1972 के अपोलो मिशन के बाद पहली बार मानव पृथ्वी से इतनी दूर जा रहा है। 2,48,000 मील लंबे इस सफर में रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हेंसन पूरी तरह स्वस्थ हैं। वे खास फ्लाईव्हील मशीनों पर कसरत कर रहे हैं, ताकि लंबी यात्रा के दौरान उनकी मांसपेशियां और हड्डियां फिट रहें।

यह 10 दिनों का सफर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि भविष्य में चांद पर बस्तियां बसाने और मंगल ग्रह तक पहुंचने की तैयारी है। विज्ञान की इस अद्भुत तकनीक ने साबित कर दिया है कि ब्रह्मांड की गहराइयों को नापना अब कोई सपना नहीं, बल्कि हकीकत है।

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