राघव चड्ढा के बचाव में उतरे AAP सांसद, पार्टी की आंतरिक कलह पर दिया बड़ा बयान
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आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को पार्टी के उपनेता पद से हटाए जाने के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है। इस कार्रवाई के बाद से पार्टी के भीतर विरोधाभासी सुर सुनाई दे रहे हैं। जहाँ एक खेमा चड्ढा पर गंभीर आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर दिग्गज सांसद नारायण दास गुप्ता उनके समर्थन में खुलकर सामने आए हैं।

जनहित के मुद्दे उठाना अपराध नहीं

राघव चड्ढा के समर्थन में बोलते हुए सांसद नारायण दास गुप्ता ने कहा कि चड्ढा ने राज्यसभा में हमेशा आम आदमी के मुद्दों को प्राथमिकता दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चड्ढा शून्यकाल (Zero Hour) का उपयोग जनहित से जुड़ी बातें रखने के लिए करते थे। हालांकि, गुप्ता ने यह भी माना कि ये मुद्दे कभी-कभी पार्टी की रणनीतिक प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते थे, खासकर तब जब पंजाब में आगामी चुनाव को लेकर पार्टी विशेष फोकस कर रही थी।

शून्यकाल की गरिमा और राजनीति

शून्यकाल की प्रक्रिया को समझाते हुए गुप्ता ने कहा कि यह किसी भी सांसद को पार्टी की अनुमति के बिना तीन मिनट तक अपनी बात रखने का अधिकार देता है। उन्होंने कहा, यदि चड्ढा सदन में बोलना चाहते हैं, तो वे अध्यक्ष से समय मांग सकते हैं। उपनेता पद से हटाना पार्टी की आंतरिक प्रक्रिया है, इसे लेकर कोई सख्त नीति नहीं है। यह पद बदलता रहता है और इसमें किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है।

चड्ढा का पलटवार: खामोश किया गया, हारा नहीं

पद से हटाए जाने के बाद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक भावुक वीडियो संदेश जारी किया। उन्होंने अपने खिलाफ हुई कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए कहा, संसद में मेरी चुप्पी को मेरी हार न समझें। जब भी मौका मिला, मैंने जनहित के ऐसे मुद्दे उठाए जो अक्सर अनदेखे रह जाते हैं। क्या आम आदमी की आवाज उठाना अपराध है?

क्या है विवाद की जड़?

सूत्रों के मुताबिक, राज्यसभा सचिवालय ने हाल ही में चड्ढा को बोलने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, क्योंकि पार्टी ने उनके लिए समय आवंटित नहीं किया था। इसके तुरंत बाद पार्टी ने आधिकारिक पत्र लिखकर अशोक कुमार मित्तल को उच्च सदन में आम आदमी पार्टी का नया उपनेता घोषित कर दिया।

जहाँ आतिशी, सौरभ भारद्वाज और संजय सिंह जैसे नेताओं ने चड्ढा पर सॉफ्ट पीआर करने और पंजाब के मुद्दों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया है, वहीं नारायण दास गुप्ता का समर्थन यह दर्शाता है कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर दो स्पष्ट खेमे बन गए हैं। अब देखना यह होगा कि पार्टी इस आंतरिक खींचतान को कैसे संभालती है।

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