नो किंग्स का नारा: अमेरिका की सड़कों पर उमड़ा 80 लाख लोगों का सैलाब, ट्रंप सरकार के खिलाफ आर-पार की जंग
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अमेरिका में इन दिनों राजनीति का पारा अपने चरम पर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विवादास्पद आव्रजन (Immigration) और विदेश नीति के खिलाफ देश भर में ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। नो किंग्स (No Kings) अभियान के तहत लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं, जिससे देश का माहौल पूरी तरह गरम है।

3,000 शहरों में गूंजी लोकतंत्र की आवाज

आयोजकों के मुताबिक, यह विरोध प्रदर्शन अचानक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा था। अमेरिका के 3,000 से अधिक शहरों में विरोध कार्यक्रम आयोजित किए गए। रिपोर्ट्स की मानें तो इस नो किंग्स डे में करीब 80 लाख लोगों ने हिस्सा लिया, जिसे अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े प्रदर्शनों में से एक माना जा रहा है।

मुख्य केंद्र: मिनेसोटा से वाशिंगटन तक

विरोध का सबसे बड़ा केंद्र मिनेसोटा का सेंट पॉल रहा, जहां करीब 2 लाख लोग मिनेसोटा स्टेट कैपिटल के बाहर जमा हुए। इसके अलावा न्यूयॉर्क, वाशिंगटन डी.सी., लॉस एंजिल्स, शिकागो और सैन फ्रांसिस्को जैसे बड़े शहरों में प्रदर्शनकारियों ने मार्च निकालकर अपनी नाराजगी जताई।

किन मुद्दों पर भड़के लोग?

प्रदर्शनकारियों का मुख्य गुस्सा दो बिंदुओं पर केंद्रित है:

  1. सख्त आव्रजन नीतियां: सरकार द्वारा उठाए गए सख्त कदमों को लेकर लोगों में गहरा असंतोष है।
  2. विदेश नीति: ईरान से जुड़े हालिया विवादों और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी नागरिक सवाल उठा रहे हैं।

हस्तियों का जमावड़ा और राजनीतिक समर्थन

सेंट पॉल की रैली में मंच पर दिग्गजों का तांता लगा रहा। मिनेसोटा के गवर्नर टिम वाल्ज, बर्नी सैंडर्स, जैन फोंडा और मशहूर गायक ब्रूस स्प्रिंगस्टीन जैसे लोगों ने विरोध को समर्थन दिया। स्प्रिंगस्टीन की प्रस्तुति ने प्रदर्शनकारियों में जोश भर दिया।

अमेरिका में राजा का कोई स्थान नहीं

नेताओं ने सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन को निशाने पर लिया। सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने स्पष्ट कहा कि अमेरिका तानाशाही की ओर नहीं जाएगा। वहीं, प्रतिनिधि जॉन बी. लार्सन ने जोर देकर कहा, अमेरिका में कोई राजा नहीं होता। अगर जनता एकजुट है, तो हमें कोई हरा नहीं सकता।

आगे क्या होगा?

विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों का सड़कों पर आना एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है। लोग अपनी संवैधानिक आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा महसूस कर रहे हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ट्रंप प्रशासन इन लाखों लोगों की आवाज सुनेगा, या यह विरोध आने वाले समय में और अधिक उग्र रूप लेगा।

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