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मध्य-पूर्व में पिछले 26 दिनों से जारी युद्ध ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। यह संघर्ष केवल मिसाइलों और सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को आपातकालीन मोड में धकेल दिया है। इस संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिलीपींस दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने आधिकारिक तौर पर नेशनल एनर्जी इमरजेंसी की घोषणा कर दी है।
फिलीपींस में एक साल का एनर्जी लॉकडाउन फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस ने देश को ऊर्जा के गहरे संकट से बचाने के लिए एक साल के आपातकाल का ऐलान किया है। हैरानी की बात यह है कि फिलीपींस इस युद्ध का पक्षकार नहीं है और युद्ध क्षेत्र से हजारों किलोमीटर दूर है, फिर भी उसे अपनी जनता को अंधकार से बचाने के लिए यह कठोर कदम उठाना पड़ा। देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं और जेट ईंधन की कमी के कारण उड़ानों में कटौती की जा रही है।
होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी: वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट की नाकेबंदी और खाड़ी देशों के तेल बुनियादी ढांचे पर हमलों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी दे रहे थे कि यह युद्ध भले ही कुछ देशों में लड़ा जा रहा हो, लेकिन इसकी आर्थिक मार पूरी दुनिया को झेलनी होगी। फिलीपींस अपनी जरूरत का 98% तेल खाड़ी देशों से आयात करता है, और सप्लाई रुकते ही वहां जनजीवन पटरी से उतर गया है।
दुनिया भर में बढ़ रहे हैं इमरजेंसी जैसे हालात यह संकट केवल फिलीपींस तक सीमित नहीं है। म्यांमार, कंबोडिया, वियतनाम, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश, जो तेल के लिए खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर हैं, गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। कई जगहों पर ईंधन बचाने के लिए वर्क-फ्रॉम-होम अनिवार्य कर दिया गया है, तो कहीं स्कूलों और विश्वविद्यालयों में छुट्टियां घोषित कर दी गई हैं। यूरोप भी इससे अछूता नहीं है, जहां ईंधन की राशनिंग शुरू हो चुकी है और बिजली के दाम आसमान छू रहे हैं।
ऊर्जा आपातकाल: सरकार के पास होंगे विशेष अधिकार एनर्जी इमरजेंसी का अर्थ है सरकार को तेल संकट से निपटने के लिए असाधारण शक्तियां देना। इसके तहत सरकार को सीधे तेल खरीदने, तेल की सप्लाई और वितरण पर नियंत्रण करने, जमाखोरी को रोकने और ऊर्जा खपत को नियंत्रित करने के कानूनी अधिकार मिल जाते हैं। फिलीपींस ने इसके लिए एक विशेष समिति बनाई है जो ईंधन, अनाज और दवाओं जैसे आवश्यक सामानों की वितरण व्यवस्था पर कड़ी नजर रखेगी।
कोयले की ओर वापसी: पर्यावरण की बड़ी कीमत इस संकट का एक और घातक पहलू यह है कि दुनिया प्रदूषण कम करने के लिए जिस कोयले को त्याग रही थी, युद्ध ने उसे फिर से प्राथमिकता दे दी है। फिलीपींस और कई अन्य देश बिजली उत्पादन के लिए गैस के बजाय कोयले पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं। यह स्थिति पर्यावरण के खिलाफ वैश्विक अभियान को कई साल पीछे धकेल सकती है।
युद्ध रुकने के बाद भी नहीं टलेगा खतरा इतिहास गवाह है कि 1973 का अरब-इजरायल युद्ध हो, 1991 का कुवैत संकट हो या 2022 का रूस-यूक्रेन युद्ध—हर बार ऊर्जा संकट ने दुनिया की कमर तोड़ दी है। आज ईरान-इजरायल के बीच जारी टकराव उसी कड़ी का सबसे गंभीर हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कल युद्ध रुक भी जाए, तो भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को इससे उबरने में कम से कम दो साल का समय लगेगा। यह युद्ध एक ऐसी आर्थिक महामारी बन चुका है, जिससे बचने का कोई रास्ता फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
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— Zee News (@ZeeNews) March 25, 2026
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