राजनीतिक यात्राओं का अपना एक अलग मौसम होता है। जब कोई नेता राजधानी की चकाचौंध छोड़कर उन इलाकों का रुख करता है, जहां स्मृतियां भी हैं और रहस्य भी, तो समझ जाना चाहिए कि सियासी हवा का रुख बदल चुका है। टीएमसी का घोषणापत्र जारी करने के तुरंत बाद ममता बनर्जी का उत्तर बंगाल पहुंचना महज एक चुनावी दौरा नहीं, बल्कि अपनी सियासी जमीन को बचाने की एक बेचैन कोशिश है।
ममता बनर्जी का तीन दिवसीय दौरा रणनीतिक रूप से बेहद चाक-चौबंद है। मयनागुड़ी, डाबग्राम-फुलबाड़ी और नक्सलबाड़ी में उनकी रैलियां और प्रशासन की भारी तैयारी इस बात का प्रमाण है कि वे इसे हल्के में नहीं ले रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि ममता का मुकाबला यहां वामपंथ की उस पुरानी लाल ब्रिगेड से नहीं है जिसने कभी नक्सलबाड़ी को जन्म दिया था, बल्कि अब उनकी मुख्य चुनौती भगवा ब्रिगेड यानी भाजपा से है।
आंकड़े ममता की चिंता का सबसे बड़ा कारण हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी उत्तर बंगाल की 215 सीटों में से मात्र 23 पर सिमट गई थी। भले ही टीएमसी का वोट शेयर (44.53%) भाजपा (42.27%) से अधिक रहा हो, लेकिन सीटों का बड़ा अंतर यह बताने के लिए काफी था कि उत्तर बंगाल अब उनके नियंत्रण से बाहर हो रहा है। यहां की भाषा, संस्कृति और पहचान दक्षिण बंगाल से बिल्कुल अलग है, जिसे समझने और भुनाने में ममता अब खुद को योग्य प्रवासी की तरह साबित करने में जुटी हैं।
कूचबिहार में स्थिति और भी जटिल है। पार्टी के पुराने वफादार खोकन मियां का कांग्रेस में जाना महज एक इस्तीफा नहीं, बल्कि बगावत की बड़ी आहट है। रबींद्रनाथ घोष जैसे कद्दावर नेताओं को किनारे करना और मुस्लिम समुदाय को टिकट न देने के फैसले ने पार्टी के भीतर भीतरघात की आग को और भड़का दिया है। एक स्थानीय नेता ने स्पष्ट कहा, क्या अल्पसंख्यक सिर्फ वोट बैंक हैं, उनका प्रतिनिधित्व क्यों नहीं?
इस बिखराव को थामने के लिए अब अभिषेक बनर्जी को मैदान में उतारा गया है। 26 मार्च से उनका अभियान शुरू हो रहा है, जिसका मकसद पार्टी की टूटी कड़ियों को जोड़ना है। लेकिन सवाल वही है—क्या यह मरहम बगावत के जख्मों को भर पाएगा? भाजपा की मजबूती सिर्फ सरकारी योजनाओं पर नहीं, बल्कि लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने पर टिकी है, जबकि टीएमसी अभी भी अंदरूनी कलह से जूझ रही है।
उत्तर बंगाल के चाय बागान, नेपाली भाषी समाज और पहाड़ी पहचान को साधना कोई आसान काम नहीं है। ममता बनर्जी की चुनावी रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ और लोगों के भरोसे के बीच का फासला ही इस जंग का परिणाम तय करेगा। फिलहाल, मुख्यमंत्री के लिए यह केवल सीटें जीतने की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस खोए हुए भरोसे को वापस पाने की जंग है, जिसे सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि जमीन पर मेहनत और जन-संवाद से ही जीता जा सकता है।
क्या ममता बनर्जी की यह नजदीकी लोगों के दिल जीत पाएगी? इसका जवाब आने वाले चुनाव ही देंगे।
*Ahead of Easter, Hon’ble Chief Minister @mamataofficial visited St. Lucy Church in Batabari, Jalpaiguri, offering prayers and engaging with members of the local community.
— All India Trinamool Congress (@AITCofficial) March 25, 2026
At a time when division is being manufactured elsewhere, Bengal continues to choose a different path. In… pic.twitter.com/lSGFlGeFi4
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