वक्फ बिल पर बवाल: क्यों भड़के मुसलमान, जानिए 5 बड़े कारण
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वक्फ संशोधन विधेयक आज लोकसभा में पेश किया जाएगा। यह विधेयक मुस्लिम समुदाय में तीव्र नाराजगी का कारण बन गया है, जिसके चलते मुस्लिम संगठन तथा विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। विधेयक में प्रस्तावित संशोधन वक्फ संपत्तियों और मुस्लिम धार्मिक संस्थानों पर प्रभाव डाल सकते हैं।

वक्फ बिल के कुछ मुख्य संशोधनों से मुस्लिम समाज में रोष व्याप्त है।

  1. वक्फ संपत्तियों का संकट: विधेयक में प्रावधान है कि यदि वक्फ बोर्ड की संपत्ति का रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, तो उसे छह महीने बाद कोर्ट से कानूनी सहायता नहीं मिलेगी। भारत में कई वक्फ संपत्तियां 500-600 साल पुरानी हैं जिनके दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। इससे इन संपत्तियों पर कानूनी विवाद हो सकता है, जिससे मस्जिदों, कब्रिस्तानों, तथा वक्फ स्कूलों को नुकसान हो सकता है। मुस्लिम समुदाय का मानना है कि इससे उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत खतरे में पड़ जाएगी।

  2. लिमिटेशन एक्ट की नई दिक्कतें: वक्फ बिल में एक और बदलाव यह है कि वक्फ बोर्ड को लिमिटेशन एक्ट, 1963 के तहत लाया गया है। इसका अर्थ है कि यदि कोई व्यक्ति 12 वर्ष या उससे अधिक समय तक वक्फ संपत्ति पर कब्जा करता है, तो वक्फ बोर्ड इस संबंध में कानूनी मदद नहीं ले पाएगा। यह प्रावधान मुस्लिम समुदाय को चिंतित कर रहा है, क्योंकि इससे वक्फ संपत्तियों का स्वामित्व बदल सकता है और धार्मिक संपत्तियां गैर-मुस्लिमों के हाथों में जा सकती हैं।

  3. सरकार का बढ़ता नियंत्रण: नए कानून के तहत वक्फ बोर्ड की सभी संपत्तियों का पंजीकरण अनिवार्य होगा, और यह अधिकार अब जिला कलेक्टर के पास होगा। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय वक्फ काउंसिल में केंद्र सरकार तीन सांसदों को नियुक्त करेगी, जिनका मुस्लिम होना अनिवार्य नहीं है। इस प्रकार सरकार का वक्फ बोर्ड पर नियंत्रण बढ़ेगा जिससे मुस्लिम समुदाय को डर है कि उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन हो सकता है।

  4. गैर-मुसलमानों की एंट्री और महिलाओं की भागीदारी: विधेयक में यह भी प्रस्तावित है कि वक्फ बोर्ड में दो महिलाओं और दो गैर-मुसलमानों को शामिल करना अनिवार्य होगा। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह बदलाव इस्लामिक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध है। इसके अतिरिक्त, विधेयक में कहा गया है कि केवल वही व्यक्ति वक्फ संपत्ति दान कर सकते हैं जो कम से कम 5 वर्ष से इस्लाम का पालन कर रहे हों। इससे वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता पर सवाल उठते हैं, और इसे समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप माना जा रहा है।

  5. वक्फनामा की अनिवार्यता: इस्लामिक परंपरा के अनुसार, मौखिक रूप से भी वक्फ संपत्ति दान की जा सकती थी, लेकिन नए कानून के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि वक्फ डीड (वक्फनामा) के बिना कोई भी संपत्ति वक्फ बोर्ड की नहीं मानी जाएगी। दान का कानूनी दस्तावेज होना आवश्यक होगा। मुस्लिम समुदाय का कहना है कि यह परिवर्तन इस्लामिक परंपराओं के खिलाफ है, क्योंकि मौखिक वक्फ को मान्यता दी जाती थी और इसे बदलने से वक्फ की धार्मिक भावना पर असर पड़ सकता है।

वर्तमान में, यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर दावा करता है, तो उसे ट्रिब्यूनल में ही अपील की जा सकती है और ट्रिब्यूनल का निर्णय अंतिम होता है। परन्तु नए विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को अब हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी। यह बदलाव भी विवाद का कारण बन रहा है, क्योंकि इससे ट्रिब्यूनल की स्वायत्तता में कमी आ सकती है और इसे सरकार द्वारा नियंत्रित किए जाने की संभावना है।

संक्षेप में, वक्फ बिल में प्रस्तावित संशोधन मुस्लिम समुदाय के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। कई लोग इसे उनके धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं और उनका मानना है कि इससे वक्फ बोर्ड और अन्य धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इस बिल का विरोध बढ़ने के बावजूद, सरकार इसे संसद में पेश करने की तैयारी कर रही है।

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