नहीं है छत, नहीं है दीवारें, बस खून-पसीने की मेहनत और खड़ा किया देश का सबसे अनूठा स्कूल
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समाज बदलेगा, शिक्षा बदलेगी ये होगा, वो होगा, कहने वाले लाखों लोग मिलते हैं। दिन भर देश बदल डालने वाले पोस्ट्स, ट्वीट्स अपलोड किये जाते हैं। मगर क्या आप जानते हैं देश बदलता कौन है? बस वही जो उठ के चल देता बदलाव लाने को, वो लम्बे लम्बे पोस्ट नहीं करता, वो पहल करता है। वो नहीं देखता कि उसकी पहल को कितने लोगों ने लाइक किया। वो अकेला ही चलता है और अवसादों की जड़ें हिला देता है।

ऐसा ही कुछ करने के लिए पंडित राजेश शर्मा 2006 में चल पड़े थे, उस अशिक्षा कि जड़ों पर चोट करने जो गरीबी के घरों में अपराध और दुर्गति का बीज बोती चली आ रही है। पेशे से दुकानदार राजेश शर्मा ने अशिक्षा से लड़ने का वो बीड़ा उठाया जिसके लिए सरकार योजनाएं बनाती रह जाती है। NGO`s कमाई का धंधा बना लेते हैं। और सद्इच्छा वाले लोग अभावों और संसाधनों की कमी का हवाला देकर भूल जाते हैं ।

देश की राजधानी और सर्वाधिक संम्पन्न शहर के बीचों बीच राजेश शर्मा ने शिक्षा का वो मंदिर स्थापित किया जिसकी कोई बिल्डिंग नहीं, जिसमें कोई यूनिफॉर्म नहीं, बैठने के लिए कुर्सियां नहीं, किताब रखने के लिए मेज तक नहीं। फिर भी वहां बच्चे पढ़ते हैं।

मेहनत और लगन से पढ़ते हैं। ख्वाब देखते हैं, पूरा करने की कोशिश करते हैं, वे इंजीनियर और डॉक्टर बनना चाहते हैं। और शिक्षा का ये मंदिर चलता है मेट्रो पुल के नीचे ।

कहाँ से शुरू हुआ ये सफर ?

अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश) के निवासी पंडित राजेश शर्मा 20 साल पहले अभावों के कारण बीएससी की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर दिल्ली आ गए थे, और जीवन यापन करने के लिए किराने की एक दुकान खोल ली। वे बताते हैं, "मैं पढ़ने में अच्छा था, लेकिन परिवार बहुत गरीब था इसलिए पढ़ाई छोड़कर दिल्ली आ गया, रोजी-रोटी चलती रहे इसलिए मैंने किराने की एक दुकान खोल ली जिससे आज भी परिवार चलता है, जब अपने पैर जम गए, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो गया तब मैंने सोचा कि अब कुछ ऐसे बच्चों को पढ़ाया जाए जिनके मां-बाप गरीब हैं और जिनके पास इतने संसाधन नहीं है कि वे बच्चों को स्कूल भेज सकें या पढ़ा सकें। यह इलाका मेरे कमरे के पास है और यहां के लोग भी गरीब ही हैं सो मैंने यहीं से शुरुआत की। यह स्कूल तो दो साल से है लेकिन मैं तो पिछले कई साल से बच्चों को पढ़ा रहा हूं" ।

वे आगे कहते हैं " हम जो काम करते हैं उसमें से अगर दो घंटे समाज के लिए दे देते हैं तो इसमें क्या बड़ी बात है , यही सोच लेंगे दो घंटे कम काम किया " मगर शायद राजेश खुद नहीं जानते के वे इस देश की झुलसती धरती को रोज़ दो घंटे अमृत पिला रहे हैं ।

कैसी है पंडित जी की पाठशाला ?

ये अनूठी और प्रेरणादायी पाठशाला दिल्ली मेट्रो के यमुना बैंक स्टेशन के पास ही एक पिलर तले चलती है। धूप और बारिश से बचने के लिया मेट्रो ब्रिज वाली छत है। ब्लैकबोर्ड के लिए पुल की दीवार का एक चौकोर हिस्सा काले रंग से रंग दिया गया है। बच्चों के बैठने के लिए कुछ गत्ते और चटाइयां हैं। ये पाठशाला सोमवार से शुक्रवार रोज़ाना दो घंटे चलती है ।

कौन कौन आता है पढ़ने ?

पंडित जी की पाठशाला सिर्फ तीन बच्चों से शुरू हुई थी। लेकिन उनकी मेहनत और आत्मविश्वास के चलते बच्चों की संख्या 150 तक पहुंच गई। अब आस-पास रहने वाले मजदूरों, रिक्शाचालकों और उन जैसे तमाम गरीब लोगों की उम्मीद ये पाठशाला है। जिनके पास अच्छे स्कूलों के लिए फीस नहीं है । और सरकारी स्कूल का हाल वे जानते हैं । अब उनके बच्चों के लिए राजेश शर्मा ही स्कूल हैं और प्रिंसिपल भी । अब राजेश अकेले नहीं हैं, उनकी इस अनूठी पहल में उनका साथ देने कई टीचर उनकी पाठशाला में अपनी सेवाएं देने लगे हैं।

राजेश जी की आर्थिक मदद करने को कई लोगों ने पेशकश भी की मगर ये उनकी सदनीयति ही है की उन्हों एक पैसा भी लेना स्वीकार नहीं किया। और साफ़ कर दिया कि यदि मदद करनी है तो बच्चों के लिए कपडे बनवा दीजिये, किताबें दान कीजिये।

राजेश ने यह साबित कर दिया कि शिक्षा का प्रचार और प्रसार कहीं भी, कभी भी हो सकता है। उनके इस ज़ज़्बे को News75 Team का सलाम।

जय हिन्द जय भारत

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