जामिया में 20 साल बाद छात्रसंघ चुनाव की वापसी: क्या बदलेगी छात्रों की तकदीर?
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दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में करीब दो दशकों का इंतजार खत्म हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने लंबे समय से चली आ रही छात्रों की मांग को मानते हुए छात्रसंघ चुनाव कराने पर अपनी लिखित सहमति दे दी है। इस फैसले के बाद कैंपस में जीत का जश्न है, लेकिन यह सवाल भी उठ रहे हैं कि आखिर दो दशक पहले चुनाव क्यों बंद हुए थे और अब क्या बदला है?

2006 में क्यों लगा था प्रतिबंध?

जामिया में आखिरी बार चुनाव 2005 में हुए थे, जिसके बाद 31 मार्च 2006 को प्रशासन ने छात्रसंघ को भंग कर दिया था। उस वक्त प्रशासन का तर्क था कि कैंपस में बढ़ती हिंसक झड़पें, शिक्षकों के साथ टकराव और अनुशासनहीनता पढ़ाई के माहौल को खराब कर रही थी। सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और गुटबाजी को रोकने के लिए चुनाव पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी गई थी।

दो दशकों तक कैसे चली व्यवस्था?

प्रतिबंध के बाद विश्वविद्यालय ने डिपार्टमेंटल सब्जेक्ट एसोसिएशन की व्यवस्था अपनाई। हालांकि, छात्र नेताओं का तर्क था कि यह व्यवस्था नाकाफी है। हॉस्टल, फीस, और परिवहन जैसे बड़े मुद्दों पर पूरे विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई एक साझा मंच नहीं था। इसे लेकर समय-समय पर छात्र आंदोलन और कानूनी लड़ाइयां भी लड़ी गईं, लेकिन प्रशासन अपने पुराने स्टैंड पर कायम रहा।

आंदोलन की आग और प्रशासन का बदलाव

इस बार का फैसला अचानक नहीं आया है। 12 अक्टूबर 2026 से शुरू हुई छात्रों की भूख हड़ताल और गहराते तनाव ने प्रशासन को मजबूर कर दिया। लगातार प्रदर्शनों और 24 अक्टूबर को ऑफलाइन कक्षाएं बंद करने जैसे कड़े फैसलों के बाद, प्रशासन और छात्रों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ। आखिरकार 26 अक्टूबर को प्रशासन ने लिखित सहमति देकर छात्रों की मांग को स्वीकार कर लिया।

चुनाव में लिंगदोह समिति का क्या होगा रोल?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी लिंगदोह समिति की सिफारिशें चुनाव की धुरी होंगी। इसमें धनबल और बाहुबल के प्रभाव को कम करने, उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता, क्लास में उपस्थिति और आपराधिक पृष्ठभूमि पर कड़े नियम शामिल हैं। यह सुनिश्चित करेगा कि छात्र राजनीति में केवल वे छात्र आएं, जो वास्तव में शिक्षा और कैंपस के हितों के प्रति गंभीर हैं।

अब आगे क्या होगा?

चुनाव प्रक्रिया में अभी वक्त है। सबसे पहले छात्रसंघ का संविधान तैयार होगा और उसे प्रशासन से मंजूरी मिलेगी। इसके बाद मतदाता सूची और उम्मीदवारों की पात्रता तय की जाएगी। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि संविधान की मंजूरी के 15 दिन बाद मतदान कराया जाएगा।

क्या छात्रों को होगा फायदा?

छात्रों का मानना है कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि होने से प्रशासन के साथ सीधा संवाद आसान होगा। फीस, हॉस्टल और लाइब्रेरी जैसी बुनियादी समस्याओं पर अब सीधे जवाबदेही तय की जा सकेगी। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि अगर छात्र राजनीति में बाहरी राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप बढ़ा, तो चुनावी खर्च और व्यक्तिगत टकराव का खतरा फिर से पैदा हो सकता है। फिलहाल, जामिया के छात्र इस बड़ी जीत का जश्न मना रहे हैं।

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