रंगभेद के खिलाफ अडिग आवाज : नावी पिल्लई को मिला 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार
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दुनिया भर में न्याय और मानवाधिकारों की पैरवी करने वाली भारतवंशी नावी पिल्लई को वर्ष 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना गया है। ओस्लो में नॉर्वे की नोबेल समिति ने 287 उम्मीदवारों में से उनके नाम का ऐलान किया। यह सम्मान पिल्लई के पांच दशकों से अधिक के उस संघर्ष को सलाम है, जिसने नस्लवाद के खिलाफ जंग से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालतों तक न्याय की नई परिभाषा लिखी।

दक्षिण अफ्रीका से वैश्विक पटल तक का सफर

23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में जन्मीं नावी पिल्लई के दादा-दादी भारत से अनुबंधित मजदूर के रूप में वहां पहुंचे थे। पिल्लई ने कानून की पढ़ाई के दौरान ही नॉन-यूरेशियन यूनिटी मूवमेंट से जुड़कर रंगभेद विरोधी मुहिम शुरू कर दी थी। 1967 में वे नेटाल में अपनी लॉ प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उस दौर में जब सरकार विरोधियों को जेल में डाल रही थी, उन्होंने राजनीतिक कैदियों और उनके परिजनों के लिए कानूनी ढाल बनकर लड़ाई लड़ी।

बलात्कार को युद्ध अपराध मानने का ऐतिहासिक फैसला

पिल्लई को वैश्विक पहचान रवांडा के अंतरराष्ट्रीय आपराधिक ट्रिब्यूनल (ICTR) में जज के तौर पर मिली। उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ जां-पॉल अकायेसु का मुकदमा रहा। उन्होंने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि बलात्कार और यौन हिंसा केवल युद्ध की लूट नहीं, बल्कि नरसंहार (Genocide) का हिस्सा हैं। इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय कानून में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक नया प्रतिमान स्थापित किया।

UN में मानवाधिकारों की रक्षक

फरवरी 2003 में वे अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) की जज बनीं। इसके बाद 2008 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने उन्हें मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर नियुक्त किया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने श्रीलंका के गृहयुद्ध में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच की मांग उठाई और दुनिया भर में दबे-कुचले लोगों की आवाज बनीं। उन्होंने इक्वालिटी नाउ जैसे संगठनों के माध्यम से महिला अधिकारों की वकालत भी की।

समानता के लिए कड़ा संघर्ष

दक्षिण अफ्रीका के संविधान में समानता की धारा जुड़वाने में पिल्लई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह धारा नस्ल, लिंग और यौन रुझान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को प्रतिबंधित करती है। ग्रुबर महिला अधिकार पुरस्कार और फोर्ब्स की शक्तिशाली महिलाओं की सूची में शामिल होना, उनके शानदार करियर की बानगी है। आज नावी पिल्लई का नोबेल सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत गौरव नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की जीत है जो कानून के शासन और मानवीय गरिमा के लिए लड़ रहे हैं।

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