लोकतंत्र पर संग्राम: चुनाव आयोग, विपक्ष और सरकार के बीच क्या है असली विवाद?
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6 अक्टूबर 2026 का दिन भारतीय राजनीति में एक बड़े टकराव का गवाह बना। INDIA गठबंधन के शीर्ष नेताओं ने जब सेव डेमोक्रेसी मार्च निकालने की कोशिश की, तो उन्हें पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और अखिलेश यादव जैसे दिग्गजों ने सड़क पर धरना दिया। इस विरोध के निशाने पर चुनाव आयोग और सरकार है। आखिर वो कौन से तीन बड़े मुद्दे हैं जिन्होंने संवैधानिक संस्थाओं और विपक्ष को आमने-सामने खड़ा कर दिया है?

मुद्दा 1: मतदाता सूची की सफाई या वोटरों को बाहर करने का खेल?

विवाद की जड़ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य मृत, दोहरे और शिफ्ट हो चुके वोटरों के नाम हटाना है। हालांकि, आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जून 2025 से अब तक 13.4 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।

विपक्ष का आरोप है कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी नाम के सॉफ्टवेयर के जरिए वैध वोटरों के नाम काटे जा रहे हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के अनुसार, दिल्ली में 32.78% मतदाता ड्राफ्ट स्टेज पर ही डिलीट कर दिए गए। वहीं, पश्चिम बंगाल में RTI से पता चला कि अपील करने पर 91% हटाए गए नाम फिर से बहाल किए गए। विपक्ष इसे बड़े स्तर पर वोटर डिस्फ्रेंचाइजमेंट (मताधिकार से वंचित करना) करार दे रहा है।

मुद्दा 2: CEC ज्ञानेश कुमार के सामने अस्तित्व का संकट

विवाद का दूसरा केंद्र मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों ने SIR से जुड़े 14 फैसलों पर असहमति जताई थी, लेकिन ज्ञानेश कुमार ने अकेले निर्णय लिए।

5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, हालांकि उन्हें निलंबित करने से इनकार कर दिया। CJI सूर्यकांत की बेंच ने स्पष्ट किया कि यदि निर्णय सर्वसम्मति से नहीं लिए गए, तो उन्हें रद्द किया जा सकता है। विपक्ष अब CEC के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इसे पीपल्स इम्पीचमेंट का नाम दे रहा है।

मुद्दा 3: वोट चोरी का सियासी आरोप

राहुल गांधी ने सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पर CEC के जरिए चुनाव चुराने का आरोप लगाया है। कांग्रेस ने SIR को MODI (Mass Disenfranchisement Of Indians through Shah Instigated Removal) का नाम दिया है।

इस पर भाजपा का पलटवार तीखा है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने पूछा कि यदि वोट चोरी हो रही है, तो विपक्षी दल केरल, कर्नाटक और हिमाचल जैसे राज्यों में चुनाव कैसे जीते? चुनाव आयोग ने भी इन आरोपों को गुमराह करने वाला बताया है और कहा है कि सभी फैसले सुप्रीम कोर्ट के नियमों के दायरे में लिए गए हैं।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की साख का सवाल

तीनों मुद्दे एक ही दिशा में इशारा कर रहे हैं—चुनाव आयोग की निष्पक्षता। जबकि भाजपा इसे प्रशासनिक सुधार और फर्जी वोटरों को हटाने की प्रक्रिया बता रही है, विपक्ष इसे लोकतंत्र पर प्रहार मानता है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि मतदाता सूची से नाम कटने के बाद बहाली की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई बार मतदाता पूरा चुनाव चक्र ही गंवा देते हैं। भले ही सरकार इसे सफाई कहे, लेकिन जब तक आयोग की कार्यप्रणाली पर संदेह बना रहेगा, तब तक यह चुनावी संग्राम शांत होता नहीं दिख रहा।

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