आगरा: ईदगाह ROB पर मंडराया मौत का साया, 60 साल पुराने जर्जर पुल से नीचे गुजरती हैं 200 ट्रेनें
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आगरा में रेलवे और लोक निर्माण विभाग की लापरवाही का एक बड़ा नमूना सामने आया है। खेरिया मोड़ और ईदगाह बस अड्डे के बीच स्थित रेलवे ओवरब्रिज (ROB) अपनी उम्र पूरी कर चुका है। 1963-64 में बना यह पुल आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है, जो किसी भी वक्त बड़े हादसे को न्योता दे सकता है।

जर्जर ढांचा और बाहर निकली सरिया

छह दशक पुराने इस पुल की स्थिति बेहद चिंताजनक है। पुल के कई हिस्सों से कंक्रीट उखड़ चुकी है और लोहे की सरिया बाहर निकल आई हैं। हालांकि, पुल की वास्तविक मजबूती का पता तकनीकी जांच से ही चलेगा, लेकिन नग्न आंखों से दिखाई दे रही दरारें और जर्जर ढांचे इंजीनियरिंग विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े कर रहे हैं।

भारी वाहनों का दबाव और सुरक्षा का सवाल

नियमों के मुताबिक, इस पुल पर भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इसके बावजूद, भारी वाहनों का बेरोकटोक आवागमन जारी है। रुई की मंडी और आसपास के इलाकों में जारी निर्माण कार्यों के चलते ट्रैफिक डायवर्जन ने इस पुल पर दबाव और बढ़ा दिया है। हजारों वाहन और राहगीर रोजाना इस जर्जर पुल से गुजरने को मजबूर हैं, जबकि नीचे से हर दिन करीब 200 ट्रेनें गुजरती हैं।

सौंदर्यीकरण बनाम मजबूती

बताया जाता है कि G-20 सम्मेलन के दौरान इस पुल का ऊपरी सौंदर्यीकरण (पेंटिंग आदि) तो किया गया, लेकिन संरचनात्मक मजबूती (Structural Stability) को नजरअंदाज कर दिया गया। केवल दिखावटी मरम्मत से पुल की उम्र नहीं बढ़ाई जा सकती। स्थानीय लोग लंबे समय से पुल के व्यापक जीर्णोद्धार की मांग कर रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन अब तक गहरी नींद में है।

क्या बड़े हादसे का इंतजार है?

उत्तर मध्य रेलवे का महत्वपूर्ण केंद्र होने के नाते आगरा में बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। यदि समय रहते इस पुल की भार क्षमता का परीक्षण और मरम्मत नहीं कराई गई, तो यह लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। जिम्मेदारों को यह समझना होगा कि हादसे के बाद जांच और मुआवजे से बेहतर है कि समय रहते सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

अब देखना यह है कि रेलवे और लोक निर्माण विभाग कब जागते हैं और कब इस पुल की तकनीकी जांच कर इसे सुरक्षित बनाया जाता है।

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