हिंदू कट्टरपंथ वाले बयान पर मचा घमासान: CM योगी ने हामिद अंसारी को घेरा, कहा- यह आदत बन गई है
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पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी द्वारा हिंदू कट्टरपंथ को भारत के लिए खतरा बताने के बाद देश की राजनीति गरमा गई है। इस बयान पर अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तीखा प्रहार करते हुए इसे भारत की छवि खराब करने का एजेंडा बताया है।

क्या है पूरा विवाद? विवाद की शुरुआत 19 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर से हुई। इस कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने दिवंगत लेखक एजी नूरानी की किताब का हवाला देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की एक टिप्पणी का जिक्र किया। अंसारी ने कहा कि नेहरू का मानना था कि भारत के लिए असली खतरा साम्यवाद नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता है।

CM योगी का कड़ा प्रहार ग्रेटर नोएडा में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंसारी के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति संवैधानिक पद पर रह चुका हो, उसे अपने आचरण की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। योगी ने कहा, कुछ लोगों की फितरत ही ऐसी होती है कि वे पद की मर्यादा नहीं समझ पाते। पद की गरिमा के खिलाफ आचरण करना उनकी आदत बन गई है।

भारत की छवि खराब करने की साजिश मुख्यमंत्री ने इस बयान को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का अपमान बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे बयानों के जरिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और सनातन परंपरा को आतंकवाद से जोड़कर पेश करने की साजिश की जाती है। योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब संवैधानिक पदों पर रहे लोग ऐसी बातें करते हैं, तो यह देश की एकता और अखंडता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।

व्यवस्था में घुसपैठ कर बदनामी योगी आदित्यनाथ ने हामिद अंसारी को भटका हुआ व्यक्ति बताते हुए उन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग व्यवस्था का हिस्सा बनकर देश की तस्वीर को विकृत करने का प्रयास करते हैं। मुख्यमंत्री के अनुसार, सनातन धर्म को कोसना और उसे कट्टरपंथ से जोड़ना न केवल समाज के लिए खतरनाक है, बल्कि यह देश की वैश्विक छवि को भी नुकसान पहुंचाता है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा हामिद अंसारी का यह बयान और उस पर योगी आदित्यनाथ की सख्त प्रतिक्रिया ने राजनीतिक बहस को नए सिरे से हवा दे दी है। एक तरफ जंहा विपक्षी दल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं भाजपा इसे भारत की सांस्कृतिक अस्मिता पर एक सुनियोजित हमला मान रही है। यह विवाद अब इस बात पर केंद्रित हो गया है कि पूर्व संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को सार्वजनिक मंचों पर देश की विचारधारा और परंपराओं पर टिप्पणी करते समय कितनी सावधानी बरतनी चाहिए।

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