रील के चक्कर में जिंदगी का रीटेक नहीं: चंद सेकंड के वीडियो ने बदल दी युवक की दुनिया
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झांसी के रक्सा इलाके के परवई गांव में रहने वाले पुष्पेंद्र की कहानी एक चेतावनी की तरह है। 30 फीट की ऊंचाई से पानी में छलांग लगाने का उनका एक एक्शन वीडियो रील के तौर पर शूट होना था। लेकिन नीचे गहरा पानी होने के बजाय चट्टानें निकलीं। नतीजा? अस्पताल का बिस्तर, पैरों में फ्रैक्चर, एक पैर में रॉड और दूसरे के लिए ऑपरेशन की नौबत।

सोशल मीडिया का नया खतरनाक नॉर्मल पुष्पेंद्र का मामला इकलौता नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर रील के लिए जान जोखिम में डालना अब एक चलन बन गया है। बरेली में फ्लाईओवर पर रील बनाते हुए फैजान की मौत हो, दिल्ली में साहिल धनेश्वरा का सड़क हादसा हो या मध्य प्रदेश और बैतूल की जानलेवा घटनाएं—ये आंकड़े बताते हैं कि वायरल होने की होड़ में लोग मौत को दावत दे रहे हैं।

लाइक्स और फोमो का खतरनाक जाल आखिर लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आशिमा के मुताबिक, लाइक्स और कमेंट्स से मिलने वाला वैलिडेशन एक तरह का नशा है। इसके अलावा फोमो (Fear of Missing Out—पीछे छूट जाने का डर) लोगों को मजबूर करता है कि वे ऐसा कंटेंट बनाएं जो बाकी दुनिया से अलग और एक्सट्रीम हो। सामान्य वीडियो अब पर्याप्त नहीं लगते, हर अगली रील पिछली से ज्यादा खतरनाक बनाने का दबाव जानलेवा साबित हो रहा है।

मनोरंजन से कमाई का जरिया, पर कीमत कौन चुकाएगा? रील अब सिर्फ मनोरंजन नहीं, करोड़ों का बाजार भी है। ब्रांड और इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी ने इसे करियर का जरिया बना दिया है। यही कारण है कि लोग सिर्फ लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि कमाई के लिए भी अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार हैं। समस्या केवल रील्स तक सीमित नहीं है; लोग इन्फ्लुएंसर्स के प्रभाव में आकर हेल्थ और लाइफस्टाइल से जुड़े गलत फैसले ले रहे हैं। बिना डॉक्टरी सलाह के खान-पान बदलना और अधूरी जानकारी पर भरोसा करना अब एक नई स्वास्थ्य समस्या बन गया है।

धार्मिक स्थलों की मर्यादा पर भी सवाल रील बनाने का जुनून केवल खतरनाक स्टंट तक सीमित नहीं है। केदारनाथ जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों पर भी रील बनाने को लेकर विवाद बढ़े हैं। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उत्तराखंड प्रशासन को ऑपरेशन मर्यादा जैसे कदम उठाने पड़े ताकि गरिमा बनी रहे।

जिंदगी का कोई रीटेक नहीं होता डिजिटल प्लेटफॉर्म ने कई लोगों को पहचान दी है और सरकार भी अच्छे कंटेंट को प्रोत्साहित कर रही है। रील बनाना गलत नहीं है, लेकिन रील की खातिर अपनी जान को दांव पर लगाना सबसे बड़ी भूल है। पुष्पेंद्र की वह रील तो कुछ सेकंड की थी, लेकिन उसका दर्द और इलाज महीनों तक चलेगा। याद रखिए, सोशल मीडिया पर व्यूज और लाइक्स तो दोबारा मिल सकते हैं, लेकिन जिंदगी का कोई रीटेक नहीं होता।

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