BRICS 2026: दिल्ली में जुट रहे दिग्गज, क्या भारत बदल पाएगा दुनिया की चाल?
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नई दिल्ली: इस सप्ताह देश की राजधानी भारत मंडपम में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है। 12-13 सितंबर तक चलने वाले इस महाआयोजन में 11 सदस्य देशों के शीर्ष नेता जुटेंगे। भारत के लिए यह मेजबानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह समूह की स्थापना के 20 साल पूरे होने का अवसर है और भारत इसका अध्यक्ष है।

क्या अब केवल आर्थिक मंच नहीं रहा BRICS?

ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुई थी, जिसमें बाद में दक्षिण अफ्रीका जुड़ा। 2009 में पहले शिखर सम्मेलन के बाद से इसका दायरा तेजी से बढ़ा है। आज यह केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शासन, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, तकनीक और स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।

ग्लोबल साउथ की शक्तिशाली आवाज

विस्तार के बाद अब ब्रिक्स में 11 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हैं। इन देशों के साथ कई साझेदार मुल्क भी जुड़ चुके हैं। यह समूह अब खुद को ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की सबसे बड़ी और सशक्त आवाज के रूप में पेश कर रहा है।

भारत के लिए संतुलन का मास्टरस्ट्रोक

भारत के लिए BRICS का महत्व उसकी रणनीतिक स्वायत्तता में छिपा है। एक ओर भारत अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मजबूत संबंध रख रहा है, तो दूसरी ओर वह ब्रिक्स के मंच से रूस, ईरान और चीन के साथ भी संवाद बनाए हुए है। यह भारत की विदेश नीति का वह अनूठा गुण है जो उसे किसी एक खेमे में बंधने से रोकता है।

चीन के साथ संबंधों की चुनौती और अवसर

दिल्ली में होने वाले इस सम्मेलन में चीन की भागीदारी पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी होंगी। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक मतभेद जगजाहिर हैं। ऐसे में BRICS एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहां दोनों देश सीधे संवाद कर सकते हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच एक बारीक संतुलन कैसे बनाए रखता है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने का दबाव

ब्रिक्स देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को लेकर बहस तेज है। न्यू डेवलपमेंट बैंक भी स्थानीय करेंसी में निवेश पर जोर दे रहा है। भारत का भी प्रयास है कि ब्रिक्स के जरिए डॉलर पर निर्भरता कम हो, जिससे भारतीय कंपनियों को नए बाजारों में आसान पहुंच मिल सके।

दुनिया इसे कैसे देख रही है?

पश्चिमी देशों (अमेरिका और यूरोप) की नजरें ब्रिक्स पर इसलिए टिकी हैं क्योंकि यह समूह तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं और ऊर्जा उत्पादक देशों का गढ़ बन गया है। हालांकि, इसे NATO जैसे सैन्य गठबंधन की तरह देखना भूल होगी। यह एक सहयोग का मंच है, टकराव का अखाड़ा नहीं।

भारत की अध्यक्षता: नया क्या होगा?

भारत के सामने 11 सदस्य देशों के जटिल ढांचे को प्रभावी ढंग से संचालित करने की चुनौती है। माना जा रहा है कि नई दिल्ली सम्मेलन में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, तकनीकी सहयोग और ग्लोबल साउथ के विकास पर विशेष जोर दिया जाएगा। यदि भारत अपनी अध्यक्षता में व्यापार और भुगतान प्रणालियों में ठोस सुधार कर पाता है, तो यह वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका को और अधिक गौरवपूर्ण बना देगा।

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