पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुराने सहयोगियों के मिलन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच बढ़ती नजदीकियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हालांकि, गठबंधन की राह में सीटों का गणित और मुख्यमंत्री पद का चेहरा सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं।
भाजपा और अकाली दल का साथ दो दशकों तक रहा, जिसने 2007 से 2017 तक पंजाब में शासन भी किया। हालांकि, 2020 में केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में अकाली दल ने एनडीए (NDA) से अपने रास्ते अलग कर लिए थे। अब, अपनी घटती साख बचाने के लिए अकाली दल और पंजाब में अपना जनाधार विस्तार करने के इरादे से भाजपा फिर एक मंच पर आने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
हाल ही में अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात ने सियासी हलचल तेज कर दी है। इसके बाद उनकी बैठक पंजाब बीजेपी के चुनाव प्रभारी सीआर पाटिल के साथ हुई, जिसे गठबंधन की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है। सीआर पाटिल के पंजाब दौरे के बाद से ही दोनों दलों के बीच सक्रियता बढ़ी है।
पुराने गठबंधन में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में था और भाजपा को केवल 23 विधानसभा सीटें दी जाती थीं। लेकिन, 2024 के लोकसभा चुनावों में अकेले दम पर शहरी इलाकों में प्रदर्शन ने भाजपा का आत्मविश्वास बढ़ा दिया है। अब भाजपा पहले की तुलना में कहीं अधिक सीटों की मांग कर रही है, जिसे अकाली दल स्वीकार करने में हिचकिचा रहा है।
दोनों दलों के बीच सबसे पेचीदा मामला मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद का है। भाजपा अब खुद को महज जूनियर पार्टनर के रूप में सीमित नहीं रखना चाहती, वहीं अकाली दल के लिए नेतृत्व की कमान छोड़ना उसकी राजनीतिक पहचान के लिए बड़ा जोखिम है। इस पर अभी तक कोई फॉर्मूला तय नहीं हो सका है।
अकाली दल के भीतर भी बादल परिवार के खिलाफ बगावत की चिंगारी सुलगती रहती है। वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष का यह बयान कि पार्टी सभी 117 सीटों पर तैयारी कर रही है, कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम पैदा कर रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे गठबंधन की तैयारी करें या अकेले लड़ने की।
सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस संभावित गठबंधन को पंजाब को लूटने की साजिश करार दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान का कहना है कि अकाली दल अब अस्तित्व बचाने के लिए भाजपा के सामने गिड़गिड़ा रहा है। कांग्रेस ने भी इसे घबराहट में उठाया गया कदम बताया है।
निष्कर्ष: गठबंधन होगा या नहीं, इसका निर्णय अब दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के हाथ में है। चुनाव का समय करीब आने के साथ ही यह साफ हो जाएगा कि क्या पंजाब की राजनीति में एक बार फिर पुराना दोस्ताना देखने को मिलेगा या दोनों पार्टियां अपनी राह खुद चुनेंगी।
Ahead of the Panjab University Student Council (PUCSC) elections, SOI has extended its support to ABVP’s presidential candidate Ankit Bidhan. The ABVP (Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad) and SOI (Student Organisation of India) have formed an alliance for the Panjab University… pic.twitter.com/Y19cipOMpj
— ANI (@ANI) August 31, 2026
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