पिता की हत्या से दिशोम गुरु बनने तक: शिबू सोरेन, जिन्होंने झारखंड की नींव रखी
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4 अगस्त 2025 को आदिवासी राजनीति के पुरोधा और दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने अंतिम सांस ली। 15 साल की उम्र में पिता की हत्या का दंश झेलने वाले एक किशोर ने कैसे पूरे राज्य की तकदीर बदल दी, यह कहानी संघर्ष और संकल्प की एक मिसाल है।

पिता की शहादत और विद्रोह की शुरुआत

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को नेमरा गांव में हुआ। जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब साहूकारों (महाजनों) ने उनके पिता शोबरन सोरेन की हत्या कर दी। इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। उन्होंने तय किया कि वह महाजनी प्रथा और आदिवासियों के शोषण के खिलाफ अंतिम दम तक लड़ेंगे।

समाज सुधार से राजनीति तक का सफर

राजनीति में आने से पहले शिबू सोरेन ने समाज सुधारक की भूमिका निभाई। उन्होंने शराबखोरी, अंधविश्वास और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई। तुंडी इलाके में रात्रि पाठशालाएं शुरू कीं, ताकि आदिवासी बच्चे शिक्षा से जुड़ सकें। उनका मानना था कि बिना शिक्षा के सामाजिक बदलाव असंभव है।

जमीन बचाओ आंदोलन ने बनाया जननायक

1970 के दशक में उन्होंने महाजनों के खिलाफ फसल जब्त, जमीन वापसी आंदोलन छेड़ा। गरीब आदिवासियों की छीनी गई जमीनें वापस दिलाने की उनकी मुहिम ने उन्हें सीधे जनता से जोड़ दिया। वे गांव-गांव में आदिवासियों की एकमात्र आवाज बन गए।

झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन

4 फरवरी 1973 को बिनोद बिहारी महतो और ए.के. रॉय के साथ मिलकर उन्होंने जेएमएम की स्थापना की। उनका एकमात्र लक्ष्य बिहार से अलग झारखंड राज्य का निर्माण था। करीब तीन दशकों तक उन्होंने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को राष्ट्रीय पटल पर रखा, जिसके कारण उन्हें झारखंड आंदोलन का आर्किटेक्ट माना जाता है।

मुख्यमंत्री का पद बनाम दिशोम गुरु की उपाधि

15 नवंबर 2000 को जब झारखंड अलग राज्य बना, तो संघर्ष का चेहरा होने के बावजूद शिबू सोरेन को सत्ता के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। वे तीन बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन उनका कार्यकाल कभी लंबा नहीं रहा। हालांकि, पद से कहीं बड़ी उनकी पहचान दिशोम गुरु के रूप में रही।

दिशोम का अर्थ समुदाय और गुरु का अर्थ मार्गदर्शक है। उन्होंने संसद से ज्यादा गांवों की चौपालों को अपनी राजनीति का केंद्र रखा।

विवाद और लोकप्रियता

शिबू सोरेन का राजनीतिक सफर विवादों से भी घिरा रहा, जिसमें रिश्वत कांड और हत्या के मामले प्रमुख थे। कई मामलों में उन्हें कानूनी राहत मिली। बावजूद इसके, आदिवासियों के बीच उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। उनके समर्थक आज भी उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद करते हैं, जिसने शोषितों को सम्मान के साथ जीना सिखाया।

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