एक सरकार ने निकाला, दूसरी ने रोका, तीसरी ने किया स्वागत : बांग्लादेश के हालातों पर तस्लीमा नसरीन के बेबाक बोल
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प्रसिद्ध बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कोलकाता में बांग्लादेश की मौजूदा अस्थिर स्थिति और वहां अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और देश की राजनीति पर खुलकर अपनी राय रखी है।

अभिव्यक्ति की आजादी और भारत का रुख अपने प्रवास के अनुभवों को साझा करते हुए तस्लीमा ने कहा, एक सरकार ने मुझे बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर किया, दूसरी ने मुझे रोका, लेकिन भारत सरकार ने मेरा स्वागत किया। उन्होंने भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सराहना की। कार्यक्रम के दौरान सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल के विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी का भी आभार व्यक्त किया।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ता खतरा तस्लीमा ने बांग्लादेश में विशेष रूप से हिंदू समुदाय की दयनीय स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि यूनिस सरकार के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों पर जुल्म बढ़ गए हैं। उन्होंने दावा किया कि मदरसों और मस्जिदों के जरिए हिंदुओं के खिलाफ नफरत का जहर घोला जा रहा है। इस्कॉन संत चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की गिरफ्तारी को उन्होंने साजिश करार देते हुए कहा कि उन्हें केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू समाज को एकजुट कर रहे थे।

समान नागरिक संहिता की वकालत लेखिका ने समान नागरिक संहिता (UCC) का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि वे पिछले 40 साल से इसके लिए आवाज उठा रही हैं और एक सभ्य समाज के लिए यह अनिवार्य है। उन्होंने आगाह किया कि यदि जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी ताकतें बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करती हैं, तो वहां किसी भी अल्पसंख्यक का जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा।

छात्र आंदोलन और लोकतांत्रिक संकट बांग्लादेश में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन पर तस्लीमा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन की आड़ में जिहादी ताकतें सक्रिय थीं, जिन्होंने जनता को गुमराह किया। शेख हसीना को देश छोड़ने के लिए मजबूर करने और आवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने को उन्होंने लोकतंत्र के खिलाफ बताया और इस पाबंदी को तत्काल हटाने की मांग की।

अंधेरे की ओर बढ़ता बांग्लादेश तस्लीमा के अनुसार, बांग्लादेश का भविष्य धुंधला होता जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार देश में सुधार लाने के बजाय केवल अपनी सत्ता को बचाने के लिए छटपटा रही है। उनके इन बयानों ने एक बार फिर पड़ोसी देश में पसरे कट्टरपंथ और वहां के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।

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