एक का सम्मान और दूसरे का अपमान : इस्तीफे के बाद की सियासत और वांगचुक का अकेलापन
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बीते कुछ दिनों में देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श में दो चेहरे केंद्र में रहे हैं। पहले हैं पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जिन्होंने हाल ही में अपने पद से इस्तीफा दिया, और दूसरे हैं सोनम वांगचुक, जिन्होंने छात्रों के अधिकारों के लिए 26 दिनों तक अनशन किया। इन दोनों के सफर का अंत बिल्कुल उलट है। जहाँ सरकार अपने नेता को योद्धा बनाकर पेश कर रही है, वहीं आंदोलन के नायक सोनम वांगचुक आज पूरी तरह अकेले पड़ गए हैं।

धर्मेंद्र प्रधान: इस्तीफा बना त्याग का प्रतीक

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद बीजेपी जिस तरह उनके समर्थन में खड़ी हुई है, वह राजनीति में एक दुर्लभ तस्वीर है। संसद पहुँचने पर पार्टी सांसदों ने तिलक लगाकर, पाग पहनाकर और नारेबाजी के साथ उनका स्वागत किया। बीजेपी का पूरा संगठन यह संदेश देने में जुटा है कि प्रधान का इस्तीफा किसी विफलता के कारण नहीं, बल्कि एक त्याग है।

अमित शाह समेत पार्टी के तमाम बड़े नेताओं का प्रधान के घर जाकर उनसे मिलना, यह साबित करता है कि संगठन अपने क्राइसिस मैनेजर को खोना नहीं चाहता। ओड़िशा में सत्ता परिवर्तन से लेकर राज्यों के कठिन चुनावों तक, प्रधान की कार्यकुशलता और आरएसएस से जुड़ी उनकी वैचारिक निष्ठा ने उन्हें पार्टी की पहली पंक्ति में बनाए रखा है।

सोनम वांगचुक: जीत के बाद अपनों से बेदखली

दूसरी ओर सोनम वांगचुक की स्थिति विपरीत है। ऐतिहासिक अनशन और सरकार को झुकाने वाले आंदोलन की सफलता के बाद जब वे राजघाट पहुँचे, तो उनके साथ उनके परिवार के अलावा कोई नहीं था। जो लोग जंतर-मंतर पर उनके चारों ओर खड़े थे, जिन्होंने आंदोलन की आग को हवा दी, वे आज नदारद हैं।

अजीब विडंबना यह है कि आंदोलन खत्म होते ही कथित बौद्धिक वर्ग और कुंठा क्लब ने वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनकी पत्नी द्वारा सनातन और विश्वगुरु जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना, इन लोगों के लिए उनके चरित्रहनन का आधार बन गया है।

कुंठा क्लब का एजेंडा और विचारधारा का चश्मा

सोनम वांगचुक के साथ जुड़े रहे लोग अब उन पर ही सवाल उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनकी प्रोफाइल पिक्चर हटाई जा रही है और उनकी पत्नी के पुराने बयानों को ढूँढकर उन्हें आरएसएस का स्वयंसेवक साबित करने की कोशिश की जा रही है।

यह वही वर्ग है जो कल तक वांगचुक को क्रांतिनायक बता रहा था, आज उनका बहिष्कार कर रहा है। स्पष्ट है कि इस पूरे मामले में सोनम वांगचुक की विचारधारा और उनके निजी विचारों के साथ आए बदलाव ने उन लोगों को नाराज कर दिया है, जो अपने एजेंडे के लिए वांगचुक को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे।

निष्ठा और राजनीति का कड़वा सच

यह घटनाक्रम एक गहरा संदेश देता है। राजनीति में पद जाने के बाद भी यदि संगठन आपके साथ खड़ा है, तो आपकी हार भी जीत में बदल जाती है। वहीं, सामाजिक आंदोलन में यदि नायक किसी एक विचारधारा के सांचे में फिट नहीं बैठता, तो उसके साथी भी उसे अकेला छोड़ने में देर नहीं करते।

पुलिस की कार्रवाई और आंदोलन की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी अपनी जगह है, लेकिन सोनम वांगचुक का यह अकेलापन उन अवसरवादी लोगों को बेनकाब करता है, जो सिर्फ अपने वैचारिक स्वार्थ के लिए दूसरों के संघर्ष का उपयोग करते हैं। धर्मंद्र प्रधान का सम्मान पार्टी की ताकत है, तो सोनम वांगचुक का अपमान उस बौद्धिक बेईमानी का प्रमाण, जो आज हमारे सार्वजनिक जीवन में गहरे तक समा गई है।

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