ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों (Commonwealth Games) में जब भारत का पहला पदक आया, तो वह सिर्फ एक धातु का टुकड़ा नहीं था, बल्कि बिहार के 28 वर्षीय पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार के वर्षों के संघर्ष का परिणाम था। झंडू ने हेवीवेट वर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया है।
तानों से शुरू हुआ सफर झंडू का जीवन आसान नहीं था। पांच साल की उम्र में पोलियो ने उन्हें दिव्यांग बना दिया। उनके इलाज में परिवार की पूरी जमा-पूंजी खत्म हो गई। लोग उनके पिता को ताने देते थे कि तुम्हारे बेटे ने सब ‘झंडू’ कर दिया (सब बर्बाद कर दिया)। यही ताना उनका नाम बन गया। उन्होंने नाम बदलने की कोशिश भी की, लेकिन सरकारी दस्तावेजों में उनका नाम ‘झंडू कुमार’ ही दर्ज रहा।
ई-रिक्शा चलाकर जुटाए पैसे आर्थिक तंगी के कारण झंडू के माता-पिता आज भी सब्जियां बेचते हैं। पावरलिफ्टिंग के लिए जरूरी पोषण और सप्लीमेंट्स का खर्च निकालने के लिए झंडू ने आठ-नौ महीने तक ई-रिक्शा चलाया। दिन भर रिक्शा चलाने से शरीर थक जाता था, लेकिन उन्होंने अभ्यास में कभी कमी नहीं आने दी।
ग्लासगो का प्रदर्शन और तकनीक शुक्रवार को उन्होंने 130.9 अंकों के साथ कांस्य पदक जीता। उन्होंने 181 और 190 किलोग्राम भार उठाया, हालांकि 196 किलोग्राम का प्रयास तकनीकी चूक के कारण असफल रहा। झंडू कहते हैं, सीखने के लिए यह अच्छा था। मैंने सुरक्षित खेला ताकि आत्मविश्वास न टूटे।
गंधीनगर से बदला करियर शुरुआत में शॉटपुट खिलाड़ी रहे झंडू को कोच कुंदन पांडेय ने पावरलिफ्टिंग के लिए प्रेरित किया। सितंबर 2023 में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के गांधीनगर केंद्र में शामिल होने के बाद उनके प्रदर्शन में निखार आया। उन्होंने सुधीर कुमार को अपना आदर्श मानते हुए यह उपलब्धि हासिल की है।
अगली मंजिल: विश्व रिकॉर्ड झंडू को अब रुकना नहीं है। उनका लक्ष्य सिर्फ राष्ट्रमंडल खेल नहीं, बल्कि पैरा एशियाई खेल और पैरालंपिक है। उनका सपना 232 किलोग्राम का विश्व रिकॉर्ड तोड़ना है। झंडू ने साबित कर दिया है कि नाम मायने नहीं रखता, मेहनत और हौसला इंसान को कहां से कहां पहुंचा सकता है।
🇮🇳 BRONZE FOR BHARAT! 🥉
— Dr Mansukh Mandaviya (@mansukhmandviya) July 24, 2026
Jhandu Kumar opens India’s #CWG2026 medal tally with a massive 190kg lift in Men’s Heavyweight Para Powerlifting. The entire nation is proud! 🇮🇳 #Cheer4Bharat pic.twitter.com/pyZSOZw0uI
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