मिडनाइट ऑपरेशन: कैसे पीएम मोदी की मास्टर स्ट्रेटेजी ने खत्म कराया सोनम वांगचुक का अनशन
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नीट (NEET) पेपर लीक मामले पर छिड़े आंदोलन ने बीते 48 घंटों में एक नाटकीय मोड़ ले लिया है। सरकार ने एक बहुआयामी रणनीति अपनाते हुए न केवल आंदोलनकारियों से संवाद स्थापित किया, बल्कि कानून-व्यवस्था को भी मजबूती से नियंत्रित किया है। इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा परिणाम सोनम वांगचुक के अनशन के समापन के रूप में सामने आया है।

12 घंटों का गेम चेंजर घटनाक्रम बीते 12 घंटों में स्थितियां तेजी से बदलीं। सरकार ने एक ओर जहां शिक्षा सचिव विनीत जोशी का तबादला कर कड़ा संदेश दिया, वहीं दिल्ली हाईकोर्ट के जरिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू की। प्रधानमंत्री मोदी ने सीधे जेन-जी (Gen-Z) को संबोधित करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया। सोशल मीडिया के इस दौर को समझते हुए इसे वर्टिकल फॉर्मेट में बनाया गया था, जिसमें पीएम ने बेहद अनौपचारिक अंदाज में छात्रों से संवाद किया।

वांगचुक का अनशन और सरकार की जीत सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त होना सरकार के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। वांगचुक, जो मेदांता अस्पताल में शिफ्ट होने के बाद आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गए थे, उन्हें जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह ने जूस पिलाकर अनशन से उठाया। दिलचस्प बात यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर कोई ठोस आश्वासन न होने के बावजूद वांगचुक का मान जाना सरकार की सफल मध्यस्थता को दर्शाता है।

विपक्ष पड़ा बैकफुट पर इस सफल मिडनाइट ऑपरेशन के बाद विपक्ष फिलहाल बैकफुट पर नजर आ रहा है। जहां राहुल गांधी ने गांधी स्मृति तक मार्च के जरिए दबाव बनाने की कोशिश की, वहीं सरकार के रणनीतिकारों का मानना है कि प्रदर्शनकारी छात्रों और आंदोलनकारियों को साधना विपक्षी दलों से कहीं अधिक आसान है। शुक्रवार से सरकार और सीजेपी (CJP) के बीच एक न्यूट्रल स्थान पर बातचीत का दूसरा दौर शुरू होना भी इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

सरकार के संकटमोचक और उनकी भूमिका इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए सरकार ने अपने चुनिंदा मंत्रियों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी थीं:

पीएम मोदी ने संभाली कमान प्रधानमंत्री मोदी ने खुद इस पूरे घटनाक्रम को लीड किया। एनडीए सांसदों की बैठक में इसे घोर पाप बताकर उन्होंने अपनी गंभीरता जाहिर की। अब सभी की निगाहें शुक्रवार की वार्ता पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े रहते हैं या सरकार के आश्वासन के साथ गतिरोध पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

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