दिल्ली में सियासी उबाल: राहुल गांधी को पुलिस ने उठाया, अखिलेश यादव हिरासत में; NEET विवाद पर बढ़ी तकरार
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नई दिल्ली: नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब देश की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र बन गया है। 21 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास के बाहर हुए प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव समेत कई दिग्गज नेताओं को हिरासत में ले लिया।

सड़कों पर दिखी पुलिस की सख्ती लोक कल्याण मार्ग पर प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी को पुलिसकर्मियों द्वारा टांगकर ले जाते हुए वीडियो सामने आया, जिससे देश भर में हलचल मच गई। विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि शिक्षा मंत्री के संरक्षण में छात्रों पर पुलिस अत्याचार हो रहा है। पीएमओ से राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने आकर धरना समाप्त करने की अपील की, जिसे नेताओं ने सिरे से खारिज कर दिया।

6 जून से शुरू हुए आंदोलन का सफर यह प्रदर्शन 6 जून को CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर से शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह आंदोलन लखनऊ, पुणे और बेंगलुरु तक फैल गया। 20 जून से जंतर-मंतर पर डेरा डाले छात्रों और समर्थकों के साथ 28 जून को लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी भूख हड़ताल पर जुड़ गए। 20 जुलाई को हुए संसद कूच के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिसमें कई छात्र घायल हुए।

AAP का तंज: क्या BJP-कांग्रेस की जुगलबंदी? आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस प्रदर्शन को भाजपा और कांग्रेस की मिलीभगत करार दिया है। आतिशी ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि जिस पुलिस ने एक महीने से CJP के प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर 100 मीटर भी नहीं बढ़ने दिया, उसने राहुल गांधी को सीधे प्रधानमंत्री आवास तक कैसे पहुंचने दिया? AAP ने मीडिया कवरेज पर भी सवाल खड़े करते हुए कहा कि एक महीने से चले आ रहे आंदोलन को नजरअंदाज करने वाले चैनल अब राहुल गांधी के धरने को लाइव दिखा रहे हैं।

सोनम वांगचुक की स्थिति चिंताजनक दूसरी ओर, लंबी भूख हड़ताल के कारण स्वास्थ्य बिगड़ने पर दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया है। कोर्ट ने उनके इलाज के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित करने का निर्देश दिया है।

सीजेपी के इस आंदोलन ने छात्रों के भविष्य को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है, जबकि अब देखना यह होगा कि विपक्षी दलों के सीधे हस्तक्षेप के बाद सरकार की अगली रणनीति क्या होती है।

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