सादे कपड़ों में लाठीबाज! प्रदर्शनों के दौरान बिना वर्दी की पुलिस पर क्यों मचे हैं सवाल?
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान एक तस्वीर ने सबको चौंका दिया। प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए तैनात पुलिस बल के बीच कई ऐसे जवान दिखे जो वर्दी में नहीं, बल्कि सादे कपड़ों में थे। इतना ही नहीं, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ये जवान प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करते भी नजर आए। इस घटना ने एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़ा कर दिया है: क्या पुलिस बिना वर्दी के बल प्रयोग कर सकती है?

सादे कपड़ों में तैनाती का असली मकसद क्या है?

आमतौर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी वर्दीधारी पुलिस की होती है। लेकिन प्रशासन विरोध प्रदर्शनों में सिविल ड्रेस में तैनाती के दो मुख्य तर्क देता है:

क्या कानून इसकी इजाजत देता है?

भारतीय पुलिस मैनुअल के अनुसार, ड्यूटी पर तैनात हर पुलिस अधिकारी के लिए वर्दी पहनना अनिवार्य है। सादे कपड़ों में काम करने की छूट केवल CID, क्राइम ब्रांच या खुफिया एजेंसियों को विशेष जांच के लिए होती है।

यदि सादे कपड़ों में कोई पुलिसकर्मी किसी को हिरासत में लेता है, तो उसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 36 के तहत अपनी पहचान स्पष्ट करनी होती है। बिना नेमटैग या पहचान के कार्रवाई करना कानूनी नियमों का उल्लंघन है।

लाठीचार्ज का आदेश: कौन और कैसे?

कानून के तहत, भीड़ को हटाने या लाठीचार्ज का आदेश केवल इलाके का मजिस्ट्रेट या थाना प्रभारी (SHO) रैंक का अधिकारी ही दे सकता है। पुलिस को पहले लाउडस्पीकर के जरिए चेतावनी देनी होती है और केवल न्यूनतम आवश्यक बल का ही उपयोग करना होता है। सादे कपड़ों में अचानक लाठियां बरसाना इस स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) का सरासर उल्लंघन है।

नागरिक की आत्मरक्षा का पेचीदा सवाल

यह स्थिति नागरिकों के लिए खतरनाक हो सकती है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 34 से 44 के तहत हर नागरिक को अपनी जान बचाने के लिए बल प्रयोग का अधिकार है। यदि सादे कपड़ों में कोई व्यक्ति किसी पर हमला करता है, तो आम नागरिक उसे हमलावर या गुंडा समझकर पलटवार कर सकता है। ऐसे में पुलिसकर्मी यह दावा नहीं कर सकता कि नागरिक ने सरकारी काम में बाधा डाली है, क्योंकि हमलावर की पहचान उजागर नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में स्पष्ट किया था कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी की पहचान बिल्कुल साफ होनी चाहिए। सादे कपड़ों में कार्रवाई करना दो बुनियादी अधिकारों का हनन है:

बाड़मेर-जैसलमेर के सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने भी इस पर सरकार से जवाब मांगा है। सादे कपड़ों में बल प्रयोग न केवल पुलिस की जवाबदेही को खत्म करता है, बल्कि लोकतंत्र में पुलिस और जनता के बीच के विश्वास को भी गहरी चोट पहुंचाता है। ऐसी घटनाओं पर विभागीय जांच और सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग उठना स्वाभाविक है।

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