दतिया में सियासी संग्राम: क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना थामेंगे नरोत्तम मिश्रा?
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दतिया विधानसभा उपचुनाव ने मध्य प्रदेश की राजनीति में हड़कंप मचा दिया है। बीजेपी द्वारा दिग्गज नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारने के बाद से ही यहां हालात विस्फोटक हो गए हैं। इस सियासी उठापटक के बीच दो बड़े घटनाक्रमों ने चुनाव की दिशा ही बदल दी है।

शिवसेना (UBT) का नरोत्तम मिश्रा को खुला ऑफर

महाराष्ट्र की सियासत से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना (UBT) ने नरोत्तम मिश्रा को दतिया से चुनाव लड़ने का खुला निमंत्रण दिया है। शिवसेना के मध्य प्रदेश प्रमुख सुनील शर्मा ने स्पष्ट किया है कि आलाकमान की मंजूरी के बाद यह प्रस्ताव भेजा गया है। उन्होंने दावा किया कि यदि मिश्रा इसे स्वीकार करते हैं, तो उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे खुद दतिया आकर उनके समर्थन में प्रचार करेंगे। हालांकि, नरोत्तम मिश्रा ने अभी तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

बीजेपी में बगावत और विरोध का दौर

आशुतोष तिवारी को टिकट मिलने के बाद से ही नरोत्तम समर्थकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। दतिया में नेशनल हाईवे जाम करने, बाजार बंद कराने और बीजेपी दफ्तर पर ताले लगाने की खबरें हैं। विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भी हुई, जिसमें कुछ पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है। बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने हालांकि इसे खारिज करते हुए कहा कि पार्टी का फैसला अंतिम है और मिश्रा के मार्गदर्शन में ही चुनाव लड़ा जाएगा।

कांग्रेस ने खेला राजघराने का कार्ड

बीजेपी के आंतरिक कलह का फायदा उठाने के लिए कांग्रेस ने दतिया राजघराने से जुड़े अनुभवी नेता घनश्याम सिंह को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया है। तीन बार के विधायक रहे घनश्याम सिंह का दतिया के चुनावी इतिहास में पुराना दखल है। उन्होंने अपनी प्राथमिकता बदले की राजनीति और जातिवाद को खत्म करना बताया है। 2008 में नरोत्तम मिश्रा से मिली हार का बदला लेने के लिए यह उनके पास एक बड़ा मौका है।

उपचुनाव की पृष्ठभूमि और तारीख

दतिया में यह उपचुनाव मौजूदा कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की अयोग्यता के कारण हो रहा है। धोखाधड़ी के एक मामले में कोर्ट से तीन साल की सजा मिलने के बाद उनकी विधायकी रद्द कर दी गई थी। अब चुनाव आयोग ने इस सीट पर 30 जुलाई को मतदान और 3 अगस्त को परिणामों की घोषणा का कार्यक्रम तय किया है।

अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नरोत्तम मिश्रा बागी तेवर अपनाते हुए शिवसेना का साथ देंगे, या फिर पार्टी अनुशासन के सामने अपना सिर झुकाएंगे। दतिया की यह लड़ाई अब महज एक सीट का उपचुनाव नहीं, बल्कि दिग्गजों के अस्तित्व का सवाल बन गई है।

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