भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार 2022 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर युवाओं से इस महासंकल्प का आह्वान किया था। अब जब समय सीमा में करीब दो दशक ही बचे हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है: एक देश को विकसित कहलाने के लिए असल में कितनी कमाई की जरूरत होती है?
आर्थिक जगत में विकसित राष्ट्र का अर्थ केवल बड़ी जीडीपी नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों का जीवन स्तर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में अभी केवल 37 देश ही विकसित की श्रेणी में आते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से 31 देश यूरोप में हैं, जबकि एशिया में केवल जापान और साउथ कोरिया इस लिस्ट में अपनी जगह बना पाए हैं। बुनियादी ढांचा, रोजगार के अवसर और प्रति व्यक्ति आय ही किसी देश के विकसित होने के मुख्य मापदंड हैं।
विश्व बैंक प्रति व्यक्ति आय के आधार पर देशों को चार श्रेणियों में बांटता है। भारत वर्तमान में लोअर मिडिल इनकम देशों की सूची में आता है। आंकड़ों की बात करें, तो भारत की वार्षिक प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,760 डॉलर (करीब 2.63 लाख रुपये) है। इसका सीधा मतलब है कि एक औसत भारतीय महीने में केवल 21 से 22 हजार रुपये कमा पा रहा है।
हाई इनकम (विकसित) श्रेणी में आने के लिए प्रति व्यक्ति आय का वर्तमान बेंचमार्क 14,375 डॉलर (करीब 13.70 लाख रुपये सालाना) है। भारत की 1.4 अरब की विशाल आबादी को देखते हुए, इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत की जीडीपी को अपने मौजूदा 4 ट्रिलियन डॉलर के स्तर से बढ़कर 20 ट्रिलियन डॉलर से अधिक करना होगा। यानी अर्थव्यवस्था को कम से कम पांच गुना रफ्तार देनी होगी।
आर्थिक सर्वे के अनुसार, विकसित भारत बनने के लिए अगले 20 वर्षों तक लगातार 8 फीसदी की जीडीपी विकास दर बनाए रखना अनिवार्य है। आईएमएफ (IMF) के ताजा अनुमानों के अनुसार, भारत 2026 में 6.4 फीसदी और 2027 में 6.7 फीसदी की दर से बढ़ने के लिए तैयार है। हालांकि हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं, लेकिन विकसित बनने के लिए हमें अपनी इस रफ्तार को और अधिक गति देने और उसे निरंतर बनाए रखने की आवश्यकता है।
The @WorldBankGroup has released its 2026-2027 Country Income Classifications.
— World Bank Group (@WorldBankGroup) July 7, 2026
Six economies moved to a higher income category, and no countries moved down.
Behind those changes are different stories, from economic recovery to export-led growth and improved statistics.
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