वर्ल्ड चैंपियन से हार की मशीन! क्या गौतम गंभीर दोहरा रहे हैं ग्रेग चैपल वाली सबसे बड़ी गलती?
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क्रिकेट भारत में महज एक खेल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं का केंद्र है। अभी कुछ महीने पहले ही देश ने टी20 वर्ल्ड कप जीतने का जश्न मनाया था, लेकिन आज वही टीम हारने की मशीन बन चुकी है। आयरलैंड के खिलाफ संघर्ष और इंग्लैंड के हाथों 0-3 से सीरीज गंवाना किसी बुरे सपने से कम नहीं है।

प्रयोग के नाम पर मैच विनर्स का अपमान

बीसीसीआई और कोच गौतम गंभीर इसे भविष्य की टीम तैयार करने का नाम दे रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि वर्ल्ड चैंपियन टीम से सूर्यकुमार यादव को बाहर क्यों किया गया? प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे संजू सैमसन को प्लेइंग-11 से हटाना और फिर टीम से बाहर कर देना समझ से परे है। यह भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि उन खिलाड़ियों का अपमान है जिन्होंने भारत को विश्व विजेता बनाया।

कप्तान श्रेयस की बेबसी और रटा-रटाया जवाब

श्रेयस अय्यर की कप्तानी में टीम का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है। फैंस जब जवाबदेही मांगते हैं, तो कप्तान का बदलाव का दौर वाला रटा-रटाया बयान जख्मों पर नमक छिड़कने का काम करता है। हैरानी की बात यह है कि टीम में अभी भी वही 60-70 प्रतिशत खिलाड़ी हैं जो वर्ल्ड कप का हिस्सा थे, फिर भी प्रदर्शन में इतनी गिरावट क्यों?

कोच गंभीर का अजीबोगरीब रवैया

कोच गौतम गंभीर का लहजा सबसे ज्यादा हैरान करने वाला है। हार को सहजता से लेना और पत्रकारों के साथ उनका आक्रामक व्यवहार टीम के माहौल पर सवाल खड़े करता है। ब्रिस्टल में जब टीम लगातार पांचवीं बार हारी, तो गंभीर प्रेस कॉन्फ्रेंस से ही गायब हो गए। एक चैंपियन कोच से उम्मीद की जाती है कि वह टीम में जीतने की आग पैदा करेगा, न कि बहानों की दीवार खड़ी करेगा।

क्या 2007 का चैपल युग वापस आ गया है?

आज के हालात 2007 के उस खौफनाक दौर की याद दिलाते हैं जब ग्रेग चैपल के एक्सपेरिमेंट ने भारतीय क्रिकेट को तबाह कर दिया था। वरिष्ठ खिलाड़ियों को किनारे करना, टीम में असुरक्षा का माहौल बनाना और सुपरस्टार कल्चर के खिलाफ जंग छेड़ना—गंभीर के दौर में सब कुछ वही दोहराया जा रहा है। इसका खामियाजा रोहित, विराट, शमी और हार्दिक जैसे दिग्गजों को भुगतना पड़ रहा है।

रबर स्टैंप बनी सिलेक्शन कमेटी?

अजीत अगरकर की सिलेक्शन कमेटी पूरी तरह से लाचार नजर आ रही है। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को नजरअंदाज करना और चहेते खिलाड़ियों पर भरोसा जताना टीम की नींव को कमजोर कर रहा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कोच की मर्जी के बिना टीम सिलेक्शन में कोई फैसला नहीं लिया जा रहा है, जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

जागने का समय आ चुका है

क्या हम जिम्बाब्वे दौरे जैसी कमजोर टीमों के खिलाफ जीत को ढाल बनाकर इन गहरे घावों को छिपाते रहेंगे? यह समय खुद को आईने में देखने का है। अगर बीसीसीआई ने अब भी आत्ममंथन नहीं किया और मैच विनर्स को सम्मान वापस नहीं दिया, तो भारतीय क्रिकेट को अर्श से फर्श तक गिरने में देर नहीं लगेगी। प्रशंसकों का गुस्सा जायज है; अब वक्त मैं से ऊपर उठकर टीम के बारे में सोचने का है।

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