दुनिया का सबसे बड़ा साइबर प्रहार: इंटरपोल के ऑपरेशन में 5,811 ठग गिरफ्तार, 2,500 करोड़ रुपये जब्त
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साइबर अपराधियों के लिए दुनिया अब छोटी पड़ रही है। इंटरपोल ने भारत समेत 97 देशों के साथ मिलकर अब तक के सबसे बड़े साइबर विरोधी अभियान ऑपरेशन फर्स्ट लाइट-2026 को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। करीब साढ़े तीन महीने तक चले इस वैश्विक ऑपरेशन ने संगठित साइबर अपराध की कमर तोड़ दी है।

2,500 करोड़ की अवैध रकम पर घेराबंदी

15 जनवरी से 30 अप्रैल 2026 तक चले इस अभियान के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इंटरपोल और सदस्य देशों की पुलिस ने 5,811 आरोपियों को गिरफ्तार किया और 15,606 संदिग्धों की पहचान की। इस दौरान 31,014 बैंक खातों को ब्लॉक किया गया और 293 मिलियन डॉलर (करीब 2,500 करोड़ रुपये) की ठगी की रकम को अपराधियों तक पहुंचने से पहले ही सुरक्षित कर लिया गया।

कैसे काम करता था डिजिटल जाल ?

यह ऑपरेशन मुख्य रूप से सोशल इंजीनियरिंग स्कैम के खिलाफ था। अपराधी तकनीकी खामियों के बजाय इंसानी भावनाओं जैसे डर, लालच और भरोसे का फायदा उठाते थे। गिरोह खुद को बैंक अधिकारी, पुलिस या सरकारी अफसर बताकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाते थे या निवेश पर भारी मुनाफे का लालच देकर उनसे पैसे ऐंठते थे।

नकली पुलिस स्टेशन का हैरान करने वाला खुलासा

इस ऑपरेशन का सबसे सनसनीखेज खुलासा अफ्रीकी देश इस्वातिनी में हुआ। वहां एक गिरोह ने बाकायदा नकली पुलिस स्टेशन बना रखा था। अपराधियों ने ब्राजील पुलिस जैसी वर्दी, नेम प्लेट और सरकारी बोर्ड लगाकर पूरा ऑफिस सेटअप तैयार किया था। वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी में अपराधी पीड़ितों को डराकर जबरन वसूली करते थे।

I-GRIP सिस्टम बना ठगों की मुसीबत

इंटरपोल के विशेष सिस्टम I-GRIP (Global Rapid Intervention of Payments) ने इस ऑपरेशन में गेम-चेंजर की भूमिका निभाई। यह प्लेटफॉर्म एक देश से दूसरे देश में ट्रांसफर हो रहे फ्रॉड के पैसों को मिनटों में ट्रैक कर ब्लॉक करने की शक्ति देता है। सिंगापुर और ओमान में इसी तकनीक की मदद से सप्लायर के नाम पर हो रही 6.6 मिलियन डॉलर की बड़ी चोरी को समय रहते रोका गया।

क्रिप्टोक्यूरेंसी और रोमांस स्कैम का जाल

थाईलैंड में पकड़े गए अपराधियों के तार रोमांस स्कैम और क्रिप्टो नेटवर्क से जुड़े थे। जांच में पता चला कि महज 20 साल के एक आरोपी के डिजिटल वॉलेट से 10 महीनों के भीतर 122.5 मिलियन डॉलर का लेनदेन हुआ था। अपराधी इन पैसों को ब्लॉकचेन के जरिए घुमाकर जांच एजेंसियों को चकमा देते थे।

साझा लड़ाई ही एकमात्र विकल्प

इंटरपोल के फाइनेंशियल क्राइम सेंटर के निदेशक टॉमोनोबू काया का कहना है कि साइबर ठग अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित हैं, इसलिए कोई भी देश इस समस्या से अकेले नहीं निपट सकता। यह ऑपरेशन इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक स्तर पर खुफिया जानकारी साझा करना ही साइबर अपराधियों को शिकस्त देने का एकमात्र रास्ता है। भारत सहित 97 देशों की इस संयुक्त कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि डिजिटल दुनिया में अब छिपना नामुमकिन है।

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