फुटबॉल का रेड कार्ड और ट्रंप की एंट्री: जानिए क्या है ये विवाद और खेल के नियम
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फुटबॉल की दुनिया में इन दिनों एक अजीबोगरीब विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। मामला किसी धांसू गोल या मैदान पर हुई हाथापाई का नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दखलंदाजी का है। ट्रंप ने फीफा (FIFA) से हस्तक्षेप कर एक खिलाड़ी का रेड कार्ड वापस करवा दिया, जिसने खेल जगत में बहस छेड़ दी है।

क्या है पूरा मामला?

2 जुलाई को अमेरिका और बोस्निया के बीच मैच चल रहा था। अमेरिकी स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन ने शानदार गोल किया ही था कि 64वें मिनट में रेफरी राफेल क्लॉस ने उन्हें रेड कार्ड दिखा दिया। स्लो-मोशन रीप्ले में बालोगुन का पैर विरोधी खिलाड़ी के टखने से टकराता दिखा था। इस कार्ड के कारण बालोगुन अगले मैच से सस्पेंड हो गए, जो टीम के लिए बड़ा झटका था।

रेड कार्ड पर ट्रंप का अजीबोगरीब तर्क

ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने फीफा से इस फैसले को रिव्यू करने को कहा था। उन्होंने कहा, बालोगुन हमारा सबसे अच्छा खिलाड़ी है। मुझे नहीं पता था कि रेड कार्ड का क्या मतलब होता है, लेकिन फिर मुझे पता चला कि इसका मतलब है कि वह अगला गेम नहीं खेल सकता। यह बहुत गलत है। आप उसे ऐसे गेम के लिए कैसे सजा दे सकते हैं जो अभी तक खेला ही नहीं गया है? ट्रंप के दबाव के बाद फीफा ने सस्पेंशन हटा दिया। हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका बेल्जियम से हारकर वर्ल्ड कप से बाहर हो गया।

आखिर ये रेड कार्ड क्या होता है?

फुटबॉल में ये कार्ड ट्रैफिक लाइट की तरह काम करते हैं:

कार्ड्स का इतिहास

फुटबॉल में कार्ड सिस्टम की शुरुआत 1970 के मेक्सिको वर्ल्ड कप में हुई थी। ब्रिटिश रेफरी केन एस्टन चाहते थे कि खिलाड़ियों को दी गई चेतावनियां दर्शकों को भी साफ दिखें। 1970 से पहले रेफरी बोलकर चेतावनी देते थे, जिससे मैदान पर काफी भ्रम पैदा होता था।

दिलचस्प बात यह है कि 1970 के वर्ल्ड कप में किसी को रेड कार्ड नहीं मिला था। पहला रेड कार्ड 1974 के वर्ल्ड कप में चिली के कार्लोस केज्स्ली को दिखाया गया था। आज यही कार्ड खेल का सबसे सख्त अनुशासन नियम माना जाता है, जिस पर अब राजनीतिक दखलंदाजी ने इसे एक नई और विवादास्पद पहचान दे दी है।

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