पाकिस्तान के साथ अमन की नई पहल: क्या 117 बुद्धिजीवियों की अपील से पिघलेगी रिश्तों की बर्फ?
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नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच क्या रिश्तों की बर्फ फिर पिघलने वाली है? क्या संवाद से आतंकवाद का दौर खत्म होगा, या आतंकवाद के अंत के बाद ही बातचीत संभव है? ये सवाल एक बार फिर चर्चा में हैं क्योंकि दोनों देशों के 117 बुद्धिजीवियों ने अपने प्रधानमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर तनाव कम करने और कूटनीतिक संबंध बहाल करने की अपील की है।

कौन हैं वे 117 लोग?

इस समूह में भारत से 61 और पाकिस्तान से 56 लोग शामिल हैं। इनमें सांसद, पूर्व राजनयिक, पत्रकार, वकील और स्कॉलर जैसे प्रभावशाली लोग शामिल हैं। इनका तर्क है कि भारत-पाकिस्तान दुनिया की 20% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, और सरहद पर जारी तनाव दोनों देशों के युवाओं के भविष्य, रोजगार और विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है।

क्या हैं मुख्य मांगें?

क्या अमन की ये उम्मीद समझदारी है या भूल?

शांति की चाहत रखने वाले लोग अक्सर पूछते हैं कि हम वफा की उम्मीद किससे कर रहे हैं? पहलगाम, पुलवामा और करगिल जैसे जख्म अभी ताजा हैं। भारत ने हमेशा शांति की पहल की है—चाहे अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा हो या पीएम मोदी की बिना बुलाए नवाज शरीफ से मुलाकात। लेकिन हर बार बदले में पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसे आतंकी हमले ही मिले। भारत अब दूध का जला, मट्ठा भी फूंक-फूंक कर पी रहा है ।

पर्दे के पीछे क्या चल रहा है?

भले ही आधिकारिक स्तर पर रिश्ते ठंडे हों, लेकिन ट्रैक-2 और ट्रैक 1.5 कूटनीति के जरिए दबी आवाजों में बातचीत जारी है। हाल ही में कोलंबो में हुई ऐसी ही एक अनौपचारिक बैठक चर्चा में रही, जिसमें दोनों देशों के पूर्व सैन्य अधिकारी और राजनयिक शामिल हुए। हालांकि, भारत सरकार का रुख स्पष्ट है—विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने साफ कर दिया है कि ऐसी निजी बैठकों का सरकार की आधिकारिक नीति से कोई लेना-देना नहीं है।

सिंधु जल संधि और नया अहम

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इन दिनों सिंधु जल संधि को लेकर काफी हताश है। अप्रैल 2025 में भारत द्वारा इस संधि को सस्पेंड किए जाने के बाद से वहाँ का सुरक्षा तंत्र तिलमिलाया हुआ है। हाल के दिनों में पाकिस्तानी नेताओं का सिंधु घाटी सभ्यता और अपने ऐतिहासिक हक पर जोर देना इसी हताशा को दर्शाता है।

निष्कर्ष: खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते

पीएम मोदी का खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते का सिद्धांत आज भी भारत की नीति का आधार है। जब तक पड़ोसी मुल्क अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए करना बंद नहीं करता, तब तक किसी भी बड़ी कूटनीतिक पहल की संभावना कम ही है। फिलहाल, यह अमन की चिट्ठी एक अच्छा विचार तो हो सकती है, लेकिन जमीन पर हकीकत बनने के लिए इसे आतंकवाद के खात्मे की मजबूत नींव की जरूरत है।

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