इलाज से पहले एडवांस पेमेंट का तकाजा: फोर्टिस अस्पताल पर उठी मौत की जिम्मेदारी, दिल्ली सरकार ने बिठाई जांच
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दिल्ली के शालीमार बाग स्थित फोर्टिस अस्पताल एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। अस्पताल प्रशासन पर आरोप है कि उन्होंने इलाज के बजाय पैसे को प्राथमिकता दी, जिसके चलते एक 28 वर्षीय युवा सुमित झा की जान चली गई। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली सरकार ने अब विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

4 जून को सुमित झा को कुछ लोगों ने चाकू मार दिया था। गंभीर हालत में उनके दोस्त उन्हें फोर्टिस अस्पताल लेकर पहुंचे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल ने सुमित का इलाज शुरू करने से पहले 30 हजार रुपये का एडवांस पेमेंट मांगा। जब तक परिवार मौके पर पहुंचा और पैसे का इंतजाम हुआ, तब तक काफी देर हो चुकी थी। नवंबर में शादी के बंधन में बंधने वाला सुमित अस्पताल की दहलीज पर जिंदगी की जंग हार गया। परिवार का आरोप है कि मौत के बाद भी अस्पताल ने शव देने के लिए 10 हजार रुपये वसूले।

क्या कहता है कानून?

सुप्रीम कोर्ट के परमानंद कटारा बनाम भारतीय संघ मामले में स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी अस्पताल (सरकारी या निजी) के लिए आपातकालीन स्थिति में मरीज का तुरंत उपचार करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसमें किसी भी तरह की कागजी कार्रवाई या भुगतान का इंतजार करना नियमों का खुला उल्लंघन है। एक डॉक्टर का धर्म मरीज की जान बचाना है, न कि बिल का हिसाब लगाना।

अस्पताल प्रबंधन का पक्ष

मामले पर विवाद बढ़ने के बाद फोर्टिस अस्पताल ने एक संक्षिप्त बयान जारी किया। अस्पताल ने कहा कि वे नियमों के पालन के लिए प्रतिबद्ध हैं और जांच में प्रशासन का पूरा सहयोग करेंगे। हालांकि, अस्पताल के बयान में मृतक सुमित झा का सीधा जिक्र न होना कई सवाल खड़े करता है।

मुनाफाखोरी का काला सच

अस्पतालों द्वारा मरीजों से भारी मुनाफ़ा वसूलने का यह कोई पहला मामला नहीं है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) की पिछली रिपोर्टों में यह खुलासा हो चुका है कि कैसे बड़े अस्पताल दवाओं और उपकरणों पर 1000 प्रतिशत से भी अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। वहां 5 रुपये का उपकरण मरीज को 10 हजार रुपये में दिया जाता है।

सिस्टम की लाचारी और आपकी जागरूकता

वर्ष 2012 के क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट रूल के तहत अस्पतालों को अपने इलाज की दरें स्थानीय भाषा में प्रदर्शित करनी अनिवार्य हैं, लेकिन 14 साल बाद भी अधिकांश राज्यों में इसे लागू नहीं किया गया है।

यदि आप या आपका कोई परिचित अस्पताल की मनमानी या लापरवाही का शिकार होता है, तो चुप न रहें:

क्या ब्रांडेड अस्पतालों की ये मनमानी इसी तरह चलती रहेगी? या फिर सुमित जैसे युवाओं की बलि के बाद सिस्टम कोई सख्त सबक सिखाएगा? यह जांच का विषय है।

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