कलेक्टर साहब! मुझे अमेरिका नहीं, भारत में मरना है : 94 साल की दादी ने छोड़ी विदेशी नागरिकता
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आज के दौर में जब हर युवा का सपना अमेरिका और कनाडा में बसना है, तब 94 साल की एक बुजुर्ग महिला ने मिसाल पेश की है। आंध्र प्रदेश के बापटला जिले की रहने वाली कोंड्रागुंटा महालक्ष्मीम्मा ने अपनी अमेरिकी नागरिकता त्याग दी है। उनकी एक ही जिद है— मैं मरूं तो एक भारतीय के तौर पर।

पति की मौत के बाद बदली थी नागरिकता महालक्ष्मीम्मा चिनागंजम मंडल के चिंथगुम्पाला गांव की रहने वाली हैं। पति नागभूषणम की मृत्यु के बाद, वह अमेरिका में बस गए अपने बेटे डॉ. के. बुचैया चौधरी के पास चली गई थीं। वहां सुरक्षा और बेटे के साथ रहने के उद्देश्य से उन्होंने अमेरिकी नागरिकता ले ली थी।

विदेश में नहीं लगा मन, 2018 में लौटीं स्वदेश अमेरिका की चकाचौंध के बीच भी दादी का दिल अपनी मिट्टी के लिए धड़कता रहा। 2018 में वह वापस अपने पैतृक गांव लौट आईं। यहीं से उन्होंने अपनी भारतीय नागरिकता को फिर से बहाल करने की प्रक्रिया शुरू की। उन्होंने स्वेच्छा से अपनी अमेरिकी नागरिकता छोड़ दी है।

कलेक्ट्रेट में भावुक अपील मंगलवार को महालक्ष्मीम्मा बापटला जिले के कलेक्टर वी. विनोद कुमार के सामने पेश हुईं। उन्होंने बड़ी भावुकता के साथ भारतीय नागरिकता के लिए निष्ठा की शपथ ली। बुजुर्ग महिला की यह अपील देखकर वहां मौजूद अधिकारी भी भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि वह अपने जीवन के अंतिम दिन अपनी जन्मभूमि में बिताना चाहती हैं और चाहती हैं कि उनका अंतिम संस्कार भी भारत में ही हो।

गृह मंत्रालय के पाले में गेंद कलेक्टर विनोद कुमार ने बताया कि बुजुर्ग महिला की इच्छा का सम्मान करते हुए कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि नागरिकता बहाल करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। अब अंतिम निर्णय भारत सरकार के गृह मंत्रालय को लेना है।

94 वर्ष की उम्र में अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर अपनी मिट्टी के प्रति यह प्रेम साबित करता है कि चाहे इंसान दुनिया के किसी भी कोने में चला जाए, अपना घर और अपनी पहचान ही सबसे बड़ी होती है।

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