सत्ता का रोटेशनल गेम और डीके शिवकुमार का धैर्य: कैसे मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा सफर?
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कर्नाटक की राजनीति में डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना देश भर में चर्चा का विषय रहा है। लंबे समय तक चली खींचतान और आलाकमान के साथ कई दौर की बैठकों के बाद आखिरकार शिवकुमार ने अपनी शर्त पूरी कराई। अब खुद मुख्यमंत्री ने इस पर्दे के पीछे की कहानी का खुलासा किया है।

धैर्य का फल और कमान का हस्तांतरण बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान डीके शिवकुमार ने सीएम बनने की प्रक्रिया को याद करते हुए कहा, मैं सिद्धारमैया के साथ गया और जो भी सत्ता हस्तांतरण को लेकर तय हुआ था, मैंने उसी के अनुसार काम किया। मैंने धैर्य रखा और एक भी बयान नहीं दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्ता का हस्तांतरण ठीक वैसा ही हुआ जैसा कि कांग्रेस आलाकमान के साथ समझौते में तय किया गया था।

क्या था ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला? मई 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। जीत के बाद सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर तनातनी बढ़ गई थी। राहुल गांधी की मध्यस्थता के बाद एक पावर शेयरिंग फॉर्मूला तय हुआ। इसके तहत, पहले ढाई साल के लिए सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि बाकी बचे कार्यकाल के लिए डीके शिवकुमार को पद सौंपने का वादा किया गया था।

केंद्र सरकार पर बरसे सीएम कार्यक्रम के दौरान डीके शिवकुमार ने केंद्र सरकार को भी निशाने पर लिया। उन्होंने राज्य के फंड में कटौती का आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र ने हमें मुश्किल में डाल दिया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की तरह कर्नाटक के साथ भी वित्तीय कटौती की जा रही है।

संगठनात्मक मजबूती पर जोर डीके शिवकुमार ने पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को भी नसीहत दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेताओं को सरकार के कामकाज की निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने निर्देश दिया कि पार्टी के सभी बीएलए (BLA) को हेल्प डेस्क के रूप में काम करना चाहिए ताकि जनसमस्याओं का समाधान समय पर हो सके।

डीके शिवकुमार का यह बयान उस राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है, जिसके दम पर उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपना धैर्य बनाए रखा और आखिरकार राज्य की सत्ता के शीर्ष पद तक पहुंचने का अपना वादा पूरा किया।

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