अमेरिका-ईरान शांति डील: जीत का दावा ट्रंप का, लेकिन बाजी मार ले गए खामेनेई?
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अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता तय समय से दो दिन पहले ही संपन्न हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने डिजिटल माध्यम से इस मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इस डील के साथ ही स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलने पर सहमति बनी है, जिससे वैश्विक तेल संकट का खतरा टल गया है।

ट्रंप की कूटनीतिक जीत के मायने राष्ट्रपति ट्रंप ने इस डील को अपनी बड़ी जीत करार दिया है। 14 बिंदुओं वाली इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि युद्ध का रुकना और होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना है। इससे दुनिया की 20 फीसदी तेल आपूर्ति सुचारू हो सकेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में उछाल की आशंका कम हो गई है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि यह परफॉर्मेंस बेस्ड डील है, जिसमें ईरान को परमाणु हथियार न बनाने का भरोसा देना होगा।

ईरान के लिए खजाना साबित हुई डील रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कागजों पर दोनों पक्ष भले ही जीत का दावा करें, लेकिन असली आर्थिक लाभ ईरान को हुआ है। डील के साथ ही ईरान पर लगे तेल, बैंकिंग, शिपिंग और इंश्योरेंस संबंधी कई कड़े प्रतिबंध हटा दिए गए। इससे ईरान की अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की पूरी संभावना है।

60 अरब डॉलर की सालाना कमाई का रास्ता वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिबंध हटने से ईरान को हर साल 60 अरब डॉलर से अधिक की अतिरिक्त कमाई हो सकती है। फिलहाल ईरान के पास 100 मिलियन बैरल तेल भंडारण में पड़ा है, जिसे अब वह अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकेगा। इसके अलावा, विदेशी बैंकों में फंसी 100 अरब डॉलर की संपत्ति तक पहुंच मिलने की उम्मीद भी ईरान के लिए एक बड़ी राहत है।

आलोचकों की नजर में अमेरिका का कमजोर पक्ष कई विशेषज्ञों का तर्क है कि अमेरिका अपने शुरुआती रुख से पीछे हट गया है। ट्रंप ने युद्ध की शुरुआत में ईरान के बिना शर्त आत्मसमर्पण की बात कही थी, लेकिन इस डील में न तो शासन परिवर्तन की कोई बात है और न ही ईरान के परमाणु ढांचे को तुरंत नष्ट करने का प्रावधान। सबसे जटिल मुद्दों को अगले 60 दिनों की बातचीत के लिए टाल दिया गया है।

क्या फिर से शक्तिशाली होगा ईरान? आलोचकों का दावा है कि अमेरिका ने दबाव बनाने का अपना सबसे बड़ा हथियार—आर्थिक प्रतिबंध—खुद ही कमजोर कर दिया है। 110 दिनों के संघर्ष के बाद भी न तो ईरान की सरकार गिरी और न ही उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म हुआ। यदि अगले 60 दिनों की बातचीत बेनतीजा रहती है, तो अमेरिका के पास ईरान पर दबाव बनाने के विकल्प पहले की तुलना में काफी कम होंगे। फिलहाल, ईरानी सुप्रीम लीडर अली खामेनेई इस समझौते से एक बड़े रणनीतिक खिलाड़ी के रूप में उभरते दिख रहे हैं।

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