जोजिला का असली हीरो: तीन बार हिमस्खलन में बहा, फिर भी नहीं मानी हार, ये है मूक-बधिर तुल्ला की जादुई कहानी
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जोजिला टनल और लद्दाख कनेक्टिविटी की चर्चा हमेशा आधुनिक इंजीनियरिंग और मशीनों के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन इस दुर्गम इलाके की असली पहचान एक ऐसा शख्स है जो न तो बोल सकता है और न सुन सकता है। इनका नाम है इनायतुल्लाह खान, जिन्हें पूरी दुनिया तुल्ला के नाम से जानती है।

मौत को मात देने वाला बुलडोजर ड्राइवर जोजिला दर्रा दुनिया की 10 सबसे खतरनाक सड़कों में गिना जाता है। यहाँ सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण रास्ता महीनों तक बंद रहता है। जब मई में बर्फ हटाने का काम शुरू होता है, तब बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) की पूरी टीम की नजरें तुल्ला पर टिकी होती हैं। वे मशीनों से भी ज्यादा तुल्ला के अनुभव पर भरोसा करते हैं।

इलाके का मानव जीपीएस तुल्ला की समझ किसी भी आधुनिक तकनीक से कहीं बेहतर है। एक बार बीआरओ की टीम ने तुल्ला की गैर-मौजूदगी में काम शुरू किया और रास्ता भटककर ग्लेशियर पर जा पहुंची। दो घंटे बाद जब तुल्ला आए, तो उन्होंने तुरंत उस जगह की ओर इशारा किया जहाँ मुख्य सड़क थी। दरअसल, वह सड़क वहां से केवल 15 फीट की दूरी पर ही दबी हुई थी।

हिमस्खलन भी नहीं रोक पाया हौसले सहकर्मियों के अनुसार, पिछले 15 वर्षों में तुल्ला तीन बार काम के दौरान हिमस्खलन (Avalanche) की चपेट में आकर बह गए। कई बार तो उनका बुलडोजर तक मलबे में गायब हो गया, लेकिन तुल्ला हर बार मौत के मुंह से सुरक्षित वापस लौट आए। हार मानना उनकी फितरत में नहीं है।

गरीबी और चुनौतियों के बीच एक मिसाल तुल्ला सोनमर्ग के नीलगिरी गांव के रहने वाले हैं। न वो स्कूल गए, न ही उनके पास औपचारिक शिक्षा है। शारीरिक अक्षमता और गरीबी के बावजूद उन्होंने बुलडोजर चलाना सीखा और आज वे बीआरओ की बीकन परियोजना के विशेषज्ञ माने जाते हैं।

बिना पहचान के भी देश की सेवा सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी संभालने के बाद भी तुल्ला स्थायी कर्मचारी नहीं हैं। वर्षों तक मामूली वेतन पर काम करते हुए भी वे हर साल बर्फबारी के बीच अपनी जान जोखिम में डालकर लद्दाख का रास्ता खोलने के लिए वापस लौट आते हैं।

बीआरओ के अधिकारी अमित चंदर कहते हैं, तुल्ला किसी भी मशीन को संभाल सकते हैं और उन्हें इस दुर्गम इलाके की हर नस की जानकारी है। आज तुल्ला की ये बहादुरी की कहानियां स्थानीय किंवदंतियों का हिस्सा बन चुकी हैं, जो हमें सिखाती हैं कि इच्छाशक्ति शारीरिक चुनौतियों से कहीं ज्यादा बड़ी होती है।

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