वीरता का भावुक पल: जब शहीद की मां के आंसुओं ने याद दिलाई आजादी की असली कीमत
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नई दिल्ली। राष्ट्रपति भवन में आयोजित वीरता सम्मान समारोह के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। राष्ट्रीय राइफल्स के बहादुर सिपाही जंजाल प्रवीण प्रभाकर को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।

मां का दर्द और राष्ट्रपति की संवेदनशीलता जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने शहीद प्रवीण की मां और पत्नी को यह पदक सौंपा, तो मां का संयम जवाब दे गया। बेटे की याद में उनकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। इस भावुक दृश्य को देखकर राष्ट्रपति भी अपनी भावनाओं पर काबू न रख सकीं और उन्होंने आगे बढ़कर शहीद की मां को गले लगाकर ढांढस बंधाया। यह पल गवाह बना कि देश की सुरक्षा के लिए एक परिवार अपनी कितनी बड़ी पूंजी खो देता है।

आजादी मुफ्त नहीं मिलती इस समारोह से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। रिटायर्ड मेजर पवन कुमार ने इसे साझा करते हुए देशवासियों को एक गंभीर संदेश दिया। उन्होंने लिखा, आजादी मुफ्त नहीं मिलती। सभी नागरिकों से गुजारिश है कि अपनी आजादी का समझदारी से आनंद लें और इसका गलत फायदा न उठाएं।

अदम्य साहस का सम्मान इस समारोह में सशस्त्र बलों के उन योद्धाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना असाधारण पराक्रम दिखाया। कुल सात कीर्ति चक्र, 15 वीर चक्र और 29 शौर्य चक्र प्रदान किए गए। कीर्ति चक्र पाने वालों में जंजाल प्रवीण प्रभाकर के अलावा सिक्किम स्काउट्स के लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी भी शामिल थे, जिन्हें मरणोपरांत सम्मानित किया गया।

दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले जांबाज समारोह में उन ऑपरेशन्स की कहानियाँ भी याद की गईं, जिन्होंने देश को सुरक्षित रखा। मेजर अंशुल बाल्टू ने असम में अकेले एक उग्रवादी को मार गिराया, जबकि मेजर लीशंगथेम दीपक सिंह ने अपने शरीर को ढाल बनाकर एक नागरिक की जान बचाई और आतंकियों को ढेर किया। वहीं, लेफ्टिनेंट कर्नल नीतेश भारती शुक्ला ने नियंत्रण रेखा पर सटीक रणनीति से तीन विदेशी आतंकियों को मार गिराया।

राष्ट्र को गर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समारोह में हिस्सा लिया और सोशल मीडिया के जरिए अपना सम्मान व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि देश को अपने इन वीर सपूतों के असाधारण साहस और राष्ट्र के प्रति निस्वार्थ सेवा पर गर्व है। यह समारोह केवल पदकों के वितरण का नहीं, बल्कि उन बलिदानों को याद करने का था, जिनकी बदौलत आज भारत सुरक्षित और स्वतंत्र है।

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