PoK में भड़की हिंसा की आग, ब्रिटेन तक पहुंचा मुनीर की फौज के खिलाफ गुबार!
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पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में छिड़ा जन-आंदोलन अब अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया है। रावलकोट में प्रदर्शनकारियों पर हुई बर्बर फायरिंग और सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ ब्रिटेन के ब्रैडफोर्ड शहर में पाकिस्तानी कॉन्सुलेट के बाहर भारी विरोध प्रदर्शन हुआ। कश्मीरी प्रवासियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

रावलकोट में खून-खराबा, सरकार पर लगे हत्या के आरोप विरोध की मुख्य वजह रावलकोट में हुई हालिया गोलीबारी है। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि सुरक्षा बलों की अंधाधुंध फायरिंग में 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 70 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हैं। हालांकि, सरकारी आंकड़े इन मौतों की संख्या 11 बता रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों में शासन और सेना के खिलाफ आक्रोश सातवें आसमान पर है।

आटे और बिजली पर सब्सिडी के लिए संघर्ष यह आंदोलन रातों-रात शुरू नहीं हुआ है। PoK की जनता लंबे समय से कमरतोड़ महंगाई और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रही है। मुख्य मांगें सस्ती बिजली और आटे पर सब्सिडी हैं। आर्थिक संकट के बीच आम आदमी के लिए जीना दुश्वार हो गया है, जिसे लेकर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) ने मोर्चा संभाला है। प्रशासन ने अब इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे हालात और भी विस्फोटक हो गए हैं।

ब्रिटिश संसद में गूंजी PoK की आवाज PoK के बिगड़ते हालात ने ब्रिटेन की राजनीति को भी हिला दिया है। ब्रैडफोर्ड ईस्ट के सांसद इमरान हुसैन के नेतृत्व में करीब 30 ब्रिटिश सांसदों ने यूके सरकार को एक पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने पाकिस्तान सरकार की कड़ी निंदा करते हुए राजनयिक हस्तक्षेप की मांग की है।

कम्युनिकेशन ब्लैकआउट और जुल्म का चक्र सांसदों ने PoK में इंटरनेट सेवाओं पर रोक और कम्युनिकेशन ब्लैकआउट को लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन बताया है। प्रदर्शनकारियों की बड़े पैमाने पर हो रही गिरफ्तारियों पर भी अंतरराष्ट्रीय चिंता जताई गई है। सांसदों का तर्क है कि जनता की आवाज दबाने के लिए सेना का इस्तेमाल करना मानवाधिकारों का घोर हनन है।

मुनीर की फौज की घेराबंदी इस पूरे प्रकरण से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की भारी फजीहत हो रही है। इंटरनेट और आवाजाही पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद, यह आंदोलन अब वैश्विक स्तर पर सहानुभूति बटोर रहा है। प्रशासन ने क्षेत्र में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती कर रखी है, लेकिन क्या मुनीर की फौज जनता के इस आक्रोश को और अधिक दिन तक दबा पाएगी? यह सवाल अब दुनिया भर के मंचों पर पूछा जा रहा है।

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